दिनचर्या
छलकते हुए बेबस बीते हैं,
फिर भी अनुस्मरण भाण्डे,
जस के तस रीते हैं।
हमको भी नहीं मालूम,
गुजरा है वक्त किस तरह,
मलाल दस्तूर बन गया ,
गश खाते है और कश पीते हैं।।
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...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
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3 Comments:
चोट गहरी है।
रीता रहा मन ! जीवन बीता इस तरह !
जिस तरह शिद्ध हिंदी और उर्दू हर्फ़ के लाजवाब अंदाज पर आपने ये ग़ज़ल तामीर करी है। .......... ये यकीन है हमको की आप जैसे कलमदान ही इस मुल्क के हिन्दू-मुस्लिम एकता के असल नुमाइंदे है।
सलाम आपको।
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