Wednesday, January 22, 2014

सदी का सबसे छोटा ठट्ठा - 'आम-आदमी' !



छवि गूगल से साभार !

अमूमन जब किसी चीज को उपहास, परिहास अथवा मजाक के नजरिये से देखा जाता है तो अक्सर कहा जाता है कि अमूक चीज उस ख़ास वक्त, साल अथवा सदी का सबसे बड़ा जोक  बन गया है।  लेकिन यहाँ बात इसके उलट है और मुझे ऐसा लगता है कि शायद ही इस सदी में कोई इससे भी छोटा जोक बन पाये और वह जोक है 'आम-आदमी'। वर्णमाला के मात्र पांच अक्षरों अथवा सिर्फ दो शब्दों का ठट्ठा (जोक )।

आम के साथ इसे वक्त का क्रूर उपहास कहिये अथवा आम का दुर्भाग्य समझिये कि जिस आम का नाम आते ही मुंह में रस आ जाता था, आज निचले दर्जे के आदमी की महत्वाकांक्षा की वजह से उसी आम का नाम सुनते ही लोगो के मुंह में गाली आ जाती है।  उस वक्त दिमाग में एक ही ख्याल दौड़ता है कि अगर कमवख्त कच्चा मिले तो अचार ड़ाल दें और अगर पका मिले तो चूसकर फेंक दे। आदमी भी बखूबी जानता है कि ये आम महाशय भी कोई हलके में लेने वाली चीज नही है।  बड़े किस्म का आम तो फिर भी थोड़ा परिपक्व और गम्भीर होता है किन्तु ये जो छोटे कद का आम है, ये है बड़ी ही कुxx  चीज।   ठीक से नहीं सम्हाला तो कब कमवख्त फिसलकर रस और गुठली समेत सड़क पर लेट जाये, कोई नही जानता और यदि आदमी ने जल्दी चूसने की हड़बड़ाहट दिखाई तो यह भी सम्भव है कि जनाब अपनी गुठली को चूसने वाले के हलक  में अटकाकर उसका 'राम नाम सत्य' भी करवा दें।  

कुल मिलाकर देखा जाए तो आम से दूरी बनाकर उसे बरतने में ही समझदारी थी, किन्तु क्या करें, बागानी जमीन पर ऐसा हरगिज सम्भव नहीं लगता।  क्योंकि  इसका और आदमी का, खासकर आर्थिक रूप से निचले दर्जे के आदमी का आपस में यूं कहिये कि हमेशा के लिए ही चोली-दमन का साथ है। आम न तो आदमी को छोड़ सकता है  और न ही आदमी आम को।   लेकिन हाल में जो कुछ देश-दुनिया में घटित हुआ और हो रहा है, उसके आधार पर मैं शर्तिया तौर पर कह सकता हूँ कि आदमी भले ही निर्लज्जता की सभी सीमाएं लांघ रहा हो, किन्तु आम  जरूर आदमी से अपनी नजदीकियों पर शर्मिंदगी महसूस कर रहा होगा।  और मुझे तो यह भी आशंका लग रही है कि इसी शर्मिंदिगी की वजह से क्या पता कहीं भविष्य में पेड़ों पर बौंर आने ही बंद हो जाये ।  

आदमी के आम से ख़ास बनने के पिछले ६६ सालों के सफ़र पर अगर नजर दौड़ाएं तो एक बात यहाँ साफ़ होती है कि ख़ास आदमी मौके पर आम आदमी बनने  का नाटक भी बखूबी कर लेता है, किन्तु आम आदमी अभी ख़ास बनने के  ड्रामे  में ख़ास आदमी से बहुत पीछे है।  अपने को आम से ख़ास दिखाने की प्रतिस्पर्धा में यह आंख का अंधा और नाम का प्रपंची अपनी अपरिपक्वता को छिपा नहीं पाता, वजह साफ है कि  उसकी हर बात पर झूठ बोलने की आदत, उसका बड़बोलापन और मोड़ मुड़ने (यूं-टर्न) की उसकी अद्भुत बचकानी क्षमता , उसकी हर क्रिया, चाहे वह निष्कपट हो अथवा छलावपूर्ण,  एक नौटंकी नजर आने लगती है। एक अदनी सी सफलता भी उसके सिर चढ़कर बोलने लगती है। कामयाबी के इस घमंड में वह अपनी सदियों पुराने तमीज और तहजीब भी भूल गया।  अपनी औकात से बाहर जाकर हाथ-पांव मारने को उतावला हो जाता है, नतीजन, चेहरे की शठता छुपाकर उसे जबरन अपनी और आम-आदमी की जीत बताने को सौंदर्य-प्रसाधनो  के उपयोग की नौबत आ जाती है।  उधर दूसरी तरफ ख़ास आदमी  के दोगलेपन और भ्रष्टाचार तथा महंगाई से त्रस्त आ चुके लोग अपने को ठगा सा महसूस करते हुए जीत शब्द की नए सिरे से परिभाषा ढूढ़ने लगते हैं।  

अब ऊपर वाला जाने  कि  आम और खास की यह आँख मिचोली का खेल उसे किस मुकाम पर ले जाकर छोड़ता है।      

7 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति को आज की सीमान्त गांधी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. ठगी और हैरत के बीच का समय है ये।

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  3. पता नहीं क्या सही है ..........

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  4. बड़ी समस्या है, आम बनने के प्रयास में व्यक्ति ख़ास हो जाता है।

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  5. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति गुरुवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  6. देखते हैं यह आम आदमी के साथ का खेल कहां जाकर रूकता है या नहीं रूकता और देश को बर्बादी की ओर किस तरह ले जाता है।

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  7. बड़ा ही टेढ़ा है यह 'आम से खास' और 'खास से आम' बनाने का सफर...राम जाने क्या होगा आगे।

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