Tuesday, February 19, 2019

गरीबी और रेखा !

तमाम जिन्दगी की मुश्किलों से तंग आकर,
आत्महत्या का ख्याल 
अपने बोझिल मन मे लिए,
मुम्बई की 'गरीबी' 
'जुहू बीच' के समन्दर पर 
पहुंची ही थी कि वहां उसे
श्रृगांरमय 'रेखा' नजर आ गई,
तज ख्याल, ठान ली जीने की फटेहाल। 
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शायद इसी को "पोजेटिव सोच" कहते हैं??....😊

3 Comments:

Blogger दिगम्बर नासवा said...

वाह .. जीने की चाह जैसे भी जागे वो पोजिटिव ही होती है ...
अच्छी रचना है ...

Wednesday, 20 February, 2019  
Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल गुरुवार (21-02-2019) को "हिंदी साहित्य पर वज्रपात-शत-शत नमन" (चर्चा अंक-3254) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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देश के अमर शहीदों और हिन्दी साहित्य के महान आलोचक डॉ. नामवर सिंह को भावभीनी श्रद्धांजलि
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डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Wednesday, 20 February, 2019  
Blogger M VERMA said...

जी हां यही है पाजिटिव सोच
और शायद यही है गरीबी और रेखा के बीच संबंध

Wednesday, 15 May, 2019  

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