Thursday, October 14, 2021

फ़कत़ जिंदा-दिली..

है कहीं अमीरी का गूम़ां

तो कहीं गरीबी का तूफ़ां,

ये आ़बोहवा, मेरे शहऱ की,

कुछ गरम है, कुछ नरम है।


कहीं तरुणाई का योवनवदन

छलकते जाम, हाथों मे रम है,

कहीं उ़म्रदराज़  हुई जो काया,

मुख़ पे झलकता बुढापे का गम है।


है कहीं पर तो फुरसत ही फुरसत

तो पास किसी के वक्त बहुत कम है,

फ़लसफ़ा जिन्दगी का अज़ब 'परचेत',

यथार्थ गायब, बस भरम ही भरम है।





5 Comments:

Blogger Pammi singh'tripti' said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 20 अक्टूबर 2021 को लिंक की जाएगी ....

http://halchalwith5links.blogspot.in
पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
!

Tuesday, 19 October, 2021  
Blogger Manisha Goswami said...

वाह बहुत ही बेहतरीन रचना

Wednesday, 20 October, 2021  
Blogger जिज्ञासा सिंह said...

आज के परिदृष्य पर सटीक, सुंदर, यथार्थवादी अभिव्यक्ति।

Wednesday, 20 October, 2021  
Blogger सुशील कुमार जोशी said...

वाह

Wednesday, 20 October, 2021  
Blogger ज्योति-कलश said...

बहुत खूब

Wednesday, 20 October, 2021  

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