विडंबना
न नींद ही बची,
न खुद को मच्छरों से ही बचा पाए,
रात भर खुजलाते-खुजलाते
करते रहे हाये-हाए,
पैर पसारने को हमने
चारपाई और चादर बडी की थी,
मगर 'परचेत',
फिर भी खुलकर नही सो पाए।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
1 Comments:
हा हा
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