Friday, December 18, 2009

जीवन सच !


रहे इम्तहानों से बेखबर,
जिन्दगी की ये रहगुजर,
भटकते हुए इधर-उधर,

जिन्दगी यूँ जाती गुजर। 

तुत्ती -बोतल से होता शुरू 
मुश्किल मंजिल-ए-सफ़र,
भरती जवानी जब देह में ,

गुजरता वक्त शीतल पेय में।  

घिरती उलझनों में जवानी ,
मन खोजता  रंगीन पानी ,
पहुँचता जब अगले तल में ,
तन सिमटता शुद्ध जल में। 

कभी बोतल मुह से घटकी ,
कभी सेज  ऊपर से लटकी,
बोतल पे  ही  ख़त्म  होता ,
बोतल से शुरू  हुआ सफर।  


रहे इम्तहानों से बेखबर,
जिन्दगी की ये रहगुजर।  


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21 Comments:

Blogger डॉ टी एस दराल said...

एक्सीलेंट, गोदियाल जी ।

जिंदगी का सफर बड़ी खूबी से ब्यान किया है।

Friday, 18 December, 2009  
Blogger अर्कजेश Arkjesh said...

वाह क्‍या निरीक्षण है आपका । जिंदगी का सफर पांच बोतल से सहारे ।

Friday, 18 December, 2009  
Blogger सदा said...

बहुत ही अच्‍छे शब्‍दों में व्‍यक्‍त जिन्‍दगी का सफर ।

Friday, 18 December, 2009  
Blogger ghughutibasuti said...

वाह!
घुघूती बासूती

Friday, 18 December, 2009  
Blogger मनोज कुमार said...

रचना अच्छी लगी।

Friday, 18 December, 2009  
Blogger Rajeysha said...

बोतलों के पड़ावों पर जि‍न्‍दगी का सफर

वाह, यह भी नजरि‍या है जि‍न्‍दगी को देखने का।
ऐसा ही कुछ नया... रोज होना चाहि‍ये।

Friday, 18 December, 2009  
Blogger Pawan Kumar said...

अच्छा है भाई..............तस्वीर ने तो जान दाल दी

Friday, 18 December, 2009  
Blogger vandana gupta said...

jeevan ka sach.............bilkul sach........chitron ke sath zindagi bayan kar di.

Friday, 18 December, 2009  
Blogger Unknown said...

"बोतल से शुरू हुई थी जो कहानी,
इकरोज बोतल पे जाके ख़त्म हो गई!!"

बहुत अच्छे!

Friday, 18 December, 2009  
Blogger Arshia Ali said...

बहुत सुंदर बात कही आपने।
------------------
जिसपर हमको है नाज़, उसका जन्मदिवस है आज।
कोमा में पडी़ बलात्कार पीडिता को चाहिए मृत्यु का अधिकार।

Friday, 18 December, 2009  
Blogger स्वप्न मञ्जूषा said...

अरे वाह गोदियाल साहब....मैंने ऐसा तो नहीं सोचा था....
क्या ज़बरदस्त बात कह दी आपने...बिलकुल सही....

बस हमारे लिए एक बोतल कम कर दीजिये .....गरम पानी वाली.....:):)

हा हा हा ...

Friday, 18 December, 2009  
Blogger योगेन्द्र मौदगिल said...

Dilli ke kavi RASIK Ratnesh pichhle 5 varshon se manch-manch par yahi samjha rahe hain,

aapne theek likha...

Friday, 18 December, 2009  
Blogger डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) said...

ज़िन्दगी के सफ़र को बहुत ही बेहतरीन लफ़्ज़ों के साथ दिखाया आपने....

Friday, 18 December, 2009  
Blogger ताऊ रामपुरिया said...

बहुत लाजवाब और नायाब.

रामराम.

Friday, 18 December, 2009  
Blogger राज भाटिय़ा said...

उम्र के संग बोतल आई ओर रंग बदलती रही, बहुत सुंदर

Friday, 18 December, 2009  
Blogger BrijmohanShrivastava said...

मज़ेदार

Friday, 18 December, 2009  
Blogger परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत बढ़िया!!!बेहतरीन।

Friday, 18 December, 2009  
Blogger श्याम जुनेजा said...

hum to sahab aapki isi baat par fida "kaanch ke gharon par pathar fenkna aur parchhaion mein insan talashna" jis aadmi ke paas yah ruchian hon uski kavita par kya tippani kee ja sakti hai sivay mast ho jane ke... ye paanch botlon wala kissa bahut pyara dil ko chhoo kar nikal jane wala kissa laga. aapke blog ki ye pahli post hi dekhi hai aage kya hai rab khair kare

Saturday, 19 December, 2009  
Blogger वाणी गीत said...

पांच बोतलों में ही पूरी जिन्दगी जी ली ....यहाँ तो लोग बोतलों पर बोतले चढ़ाये भी बीच मझधार में अटके हैं ...!!

Saturday, 19 December, 2009  
Blogger अजय कुमार said...

जरूरत के हिसाब से बोतल का माल बदलता रहा

Saturday, 19 December, 2009  
Blogger संजय भास्‍कर said...

बहुत खूब .जाने क्या क्या कह डाला इन चंद पंक्तियों में

Saturday, 19 December, 2009  

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