Thursday, December 10, 2009

पूरे पैर पसार सोने की चाहत !

पूस की रात, दिल्ली की कुहास भरी ठण्ड, एक छोटे से सफ़र पर निकला था अमृतसर तक।  निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर कोने से सटी बेंच पर बैठ, गाडी का इन्तजार कर रहा था।  बेंच  के बगल में ही कोई मानव रुपी जीव पुरानी सी एक कम्बल ओढ़ , प्लेटफॉर्म के फर्श पर अपनी दिनभर की थकान मिटाने को व्यग्र , पैर लम्बे पसारकर  करवट बदल रहा था।  तभी कुछ दूरी से बूटो की कदमताल खामोशी को तोड़ते मेरे वाले बेंच की ओर बढ़ी , रेलवे सुरक्षा बल के जवान थे वो ।  पास से  गुजरते हुए मैं उन्हें देख  ही रहा था कि तभी अचानक मेरी ध्यान निद्रा टूटी यह देखकर कि एक जवान ने चादर  ताने उस  मानव जीव पर अपने बूट की ठोकर मारी और कड़ककर बोला, " हे बिहारी, पैर भांच के सो" !


बूट की ठोकर से और  कडकडार सुर सुनकर  वह  जीव हडबडाकर  उठ बैठा था।  एक नजर दूर जाते जवानो पर और एक नजर उसने मुझपर डाली।  यही कोई ६०-६५ साल का वृद्ध, कोई रिक्शा चालाक सा मुझे लगा।   उसने अपनी  पुरानी कम्बल फिर से अपने ऊपर  ओढ़ी और बडबडाया, "हे प्रभु ! वो दिन कब आयेगा जब मैं पूरे पैर पसार कर सो पाऊँगा,बेख़ौफ़,किसी के बूट की ठोकरों से बेखबर ?? "

Labels:

17 Comments:

Blogger vandana gupta said...

kya kahun?

Thursday, 10 December, 2009  
Blogger IRFAN said...

Bahut samvedansheel kavita hai aapki.jis desh mein pair tak failaane per pabadi ho ,vahaan samvednaaon ka dam ghutne jaisi baat hai.

Thursday, 10 December, 2009  
Blogger वाणी गीत said...

कहीं दो जनों के रहने के लिए कई कई आलीशान कोठियां है तो कही पैर पसार लेने जितनी जगह भी नहीं ....क्या यही ईश्वर का न्याय है ...?

Thursday, 10 December, 2009  
Blogger सदा said...

बहुत ही सुन्‍दरता से प्रस्‍तु‍त किया आपने सच्‍चाई को ।

Thursday, 10 December, 2009  
Blogger Unknown said...

समय बदल जाता है पर सभी काम वैसे ही चलते हैं जैसे चलते थे। कभी अंग्रेज हमें बूट से ठोकर मारते थे और अब .....

Thursday, 10 December, 2009  
Blogger ghughutibasuti said...

एक छोटी सी चाहत, जो शायद ही कभी पूरी हो पाए।
बहुत सुन्दर लिखा है।
घुघूती बासूती

Thursday, 10 December, 2009  
Blogger निर्मला कपिला said...

"हे प्रभु ! वो दिन कब आयेगा,
जब मैं पूरे पैर पसार कर सो पाऊँगा,बेख़ौफ़,
किसी के बूट की ठोकरों से बेखबर ?? "
सही सवाल है उसका इस देश मे एक अमीर और गरीब मे फर्क ही इतना है? दुख होता है जब इसका जवाब किसी के पास नहीं मिलता। अच्छी कविता के लिये बधाई

Thursday, 10 December, 2009  
Blogger Kusum Thakur said...

बेख़ौफ़ सोने की तमन्ना शायद ही पूरी हो ......बहुत अच्छी रचना !

Thursday, 10 December, 2009  
Blogger पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

सर्वप्रथम आप सभी का हार्दिक शुक्रिया और धन्यवाद , अपने सुधि पाठको को बताना चाहूंगा कि यहाँ पर ' बेख़ौफ़ पैर पसार कर सोने' से आशय उस वृद्ध द्वारा भगवान् से अपने लिए मौत मांगने से है !

Thursday, 10 December, 2009  
Blogger डॉ टी एस दराल said...

बहुत गहरी बात छुपी है।
यहाँ कितने ही लोग ऐसे हैं, जिन्हें मरकर ही मुक्ति मिलती है।
या फ़िर , पता नही --मिलती भी है या नही।

Thursday, 10 December, 2009  
Blogger डॉ टी एस दराल said...

और हाँ, गौदियल जी, ब्लॉग अब ठीक काम कर रहा है। कुछ विजेट्स हटाने से ठीक हो गया। धन्यवाद।

Thursday, 10 December, 2009  
Blogger मनोज कुमार said...

उस सोये जीव पर बूट की ठोकर मारी
और कड़ककर बोला,
" हे बिहारी, पैर भांच के सो" !!
सूतने तो दिया न कम से कम। नहीं त ईहो त कह सकता था रे ....या भाग ईहां से।

Thursday, 10 December, 2009  
Blogger दिगम्बर नासवा said...

bahut samvedansheel rachna hai ... gareeb to apni gareebi ka daam thokren khaa kar de raha hai ...

Thursday, 10 December, 2009  
Blogger Dinesh Dadhichi said...

मर्मस्पर्शी रचना !

Friday, 11 December, 2009  
Blogger संजय भास्‍कर said...

एक छोटी सी चाहत, जो शायद ही कभी पूरी हो पाए।
बहुत सुन्दर लिखा है।

Friday, 11 December, 2009  
Blogger नीरज गोस्वामी said...

आप की ये रचना बहुत सी बातों को बेनकाब कर गयी...पढ़ कर शर्मिंदा हूँ...हम कब इंसान बनेगे ???
नीरज

Friday, 11 December, 2009  
Blogger Unknown said...

jidhar dekho haiwan hi nazar aate hai. Insan hai hi kahan. bas aapno duty karni hai aur mahine par pagar chahiye. Na insane bacha hai na Insaniyat bhai.....

Wednesday, 16 December, 2009  

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home