Monday, August 2, 2010

अब अपना मुह बंद रखे इस वृहत लोकतंत्र के तंग दिल सनम !

भ्रष्ठाचार और मक्कारी तो मानो हमारी रग-रग में रची बसी है ! सार्वजनिक धन की चोरी को हम अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते है, और ऊपर से सीना जोरी भी ! शरमो-हया और दुनिया की लोक-लाज तो जयचंद के कुटुंबी वंशजों ने तभी बेच खाई थी, जब मंगोलों, मुगलों और फिरंगियों ने इन जयचंद की औलादों की मदद से बारी-बारी से हमारी इस पावन भूमि को अपवित्र किया था! कुछ ही पृथ्वीराज थे, जो जी-जान और मेहनत से तीन-तीन गुलामियों की मार झेलते हुए भी थोड़ा बहुत अपनी और अपने देश की पारंपरिक संस्कृति, लोक-लाज और सत्यनिष्ठा को बचाए रखने में कामयाब रहे थे ! मगर उन्हें क्या मालूम था कि कालान्तर में युगों से भेड़ की खालों में छुपे बैठे कुछ जयचंद के घरेलू भेड़िये, एक दिन आजादी मिलने पर अचानक लोकतंत्र की आढ़ में शराफत, इमानदारी, समानता, कौशल और नेतृत्व का नकली लवादा ओढ़कर देश में बची-खुची शर्मो-हया का भी गला घोंट देंगे !

मजेदार बात यह नहीं है कि देश में फैले भ्रष्ठाचार और अराजकता से पर्दा उठ रहा है, अपितु मजेदार बात यह है कि कुछ शकुनियों के फेंके फांसे उन पर ही उलटे पड़ने लगे है! जैसा कि मैं पहले भी अपनी पोस्टों में लिख चुका हूँ कि आयोजन की तैयारियों में देरी जानबूझकर दो कारणों से की गई थी; एक तो यह कि आयोजन स्थल के कर्ता-धर्ताओं को २००८-०९ में दोबारा गद्दी पाने की उम्मीद कम ही थी, इसलिए वे आने वाले अज्ञात कर्ता-धर्ता के लिए मुसीबतों का पहाड़ छोड़ना चाहते थे! ताकि आगे चलकर वे खुद इसका राजनैतिक फायदा उठा सकें ! लेकिन उनका दुर्भाग्य ही कह लीजिये कि वे फिर से गद्दी पा गए ! इसे वोटरों की महानता कह लीजिये या फिर उस पालनहार की सटीक लाठी, जो इनकी चाल इन पर ही उल्टी पड़ गई ! दूसरा यह कि इसतरह की अवधारणा इस निर्माण कार्य से जुड़े ज्यादातर भ्रष्ट लोग लेकर चल रहे थे कि घटिया स्तर के निर्माण कार्य को अंतिम क्षणों तक खींचा जाए ताकि आख़िरी में समय की कमी की वजह से किसी को यह देखने का अवसर ही न मिले कि घटिया निर्माण हुआ है, लेकिन यह लीपापोती भी उल्टी पड़ गई ! अनमने मन से ही सही किन्तु इंद्रदेवता को भी इसके लिए धन्यवाद दिया जा सकता है !

ऐसा भी नहीं है कि इस सारे चक्रव्यूह के लिए सिर्फ आयोजन कर्ताओं को ही जिम्मेदार ठहराया जाए ! इसके लिए जर्जर हो चुका पूरा सिस्टम भी काफी हद तक जिम्मेदार है, वह सिस्टम, जिसे सदियों पहले अंग्रेजों ने यह मानकर हिन्दुस्तानियों के लिए बनाया था कि ८० प्रतिशत भारतीय चोर है ! और फिर वे अंग्रेज अपने पीछे इस देश में उनके बनाए उस सिस्टम की देखभाल के लिए एक ऐसी पार्टी छोड़ गए जो बड़ी परायणता और कर्तव्यनिष्ठा से आज भी उसे बनाए रखे है ! हमारे मीडिया वालों को चठ्कारे लेकर सनसनी फैलाने की तो बड़ी महारत हासिल है, मगर तब ये कहाँ सो रहे थे जब आज खुद को भला इंसान दिखने वाला सालों फाइल के ऊपर बैठा रहा ? ये तब कहाँ थे जब मंत्रालय अपने लल्लू -पंचूओ को इस पूरे निर्माणकार्य की रूपरेखा तैयार करने के लिए मनोनीत कर रहे थे! ये तब कहाँ थे जब समय की नजाकत को न समझते हुए हमारे देश के न्यायालयों में कुछ संस्थाओं द्वारा निर्माणकार्य की राह में खड़े किये गए विवादों को सुलझाने में देरी हो रही थी ? तब कहाँ थे, जब निर्माणकार्य के लिए घटिया सामग्री आ रही थी? तब कहाँ थे जब पारिवारिक खान से खरीदकर सड़क किनारों पर लाल टाइले लगाईं जा रही थी? अब जब स्टेडियम के लिए ऐप्रूभ्ड ड्राइंग ही साल-छह महीने पहले निर्माण कार्य में लगी एजेंसियों को दोगे तो वे अलादीन का चिराग घिसकर जिन्न को बुला रातों-रात तो निर्माण कार्य पूरा नहीं कर लेंगे न ?

हाँ, मैं सिस्टम की बात कर रहा था, कल से खबरिया चैनलों और पत्र-पत्रिकाओं में बड़े मजे लेकर जोरशोर से इस बात को उठाया जा रहा है कि कीमत से कई अधिक मूल्य पर आयोजन सामग्री किराए पर ली जा रही है, तो जनाव, एक तरफ अगर समय पर कार्य पूरा करने का दबाव हो और दूसरी तरफ वह जर-जर सिस्टम जिसमे एक क्लास वन आफिसर भी स्वयं निर्णय लेकर एक कुर्सी तक नहीं खरीद सकता, उसके लिए टेंडर भरो, फाइल को मंत्रालय तक पहुँचाओ और इस माध्यम के बीच कई हस्तियों की आवभगत करो, तो उसके लिए इन्तजार का वक्त किसके पास था? क्या कभी किसी ने उस और ध्यान देकर वह बात उजागर की ? हमारे लिए शर्म की इससे बढ़कर और क्या बात हो सकती है कि दूसरे देश की एजेंसिया हमें सतर्क कर रही है कि जाग जाओ कहीं कुछ बड़ी गड़बड़ चल रही है ! इस देश के एक आम आदमी के खून पसीने की कमाई से एकत्रित टैक्स का इस तरह का दुरुपयोग देख विदेशी भी चुप नहीं रह पाए !

कुल मिलाकर निष्कर्ष यह निकलता है कि अपने युवराज के ऑस्टेरिटी (त्याग / मितव्यता) आव्हान की हवा ये कमवक्त भ्रष्ट लोग इस तरह नेहरु स्टेडियम में जाकर निकालेंगे, शायद सम्राज्ञी ने भी सपने में नहीं सोचा होगा! ४००० करोड़ रूपये खर्च का प्रारम्भिक आंकलन अगर सत्रह गुना बढ़ जाए तो भृकुटियाँ तनना भी स्वाभाविक है! यही अगर इनके ऑस्टेरिटी की मिसाल है तो भगवान् बचाए इनकी गिद्ध नजरों से इस देश को ! इस मुद्दे पर अब जाकर चिल-पौं मचाने वालों से भी यही कहूंगा कि आप यह बात भली प्रकार से जानते है कि आज से पहले इस देश में हुए बड़े-बड़े घोटालों का हश्र क्या हुआ ? और अंत में मेरी भी इस दुनिया के पालनहार से हाथ जोड़कर यह प्रार्थना है कि हे भगवन, ये आयोजन जैसे भी हो ठीक ठीक ही निपट जाए और देश की इज्ज़त पर कोई आंच न आने पाए !
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18 Comments:

Blogger ताऊ रामपुरिया said...

ये आयोजन जैसे भी हो ठीक ठीक ही निपट जाए और देश की इज्ज़त पर कोई आंच न आने पाए !

बेहद सटीक लिखा और हर जिम्मेदार नागरिक की यही ख्वाहिश है कि इज्जत बची रहे.

रामराम

Tuesday, 03 August, 2010  
Blogger vandana gupta said...

बात तो आपने सही उठाई है मगर क्युँ आप ही देशभक्त बने और देश की इज़्ज़त का सोचें ……………मै तो कहती हूँ इस बार देश की इज़्ज़त मिट्टी मे मिल ही जाये ताकि यहाँ की जनता के साथ साथ देश के हर नेता की भी आँख खुल जाये और फिर कोई दोबारा देश की जनता की गाढी कमाई का दुरुपयोग करने का साहस नही कर सके…………………भ्रष्टाचार और बेईमानी की अब तो इंतिहा हो चुकी है इसलिये सबक मिलना जरूरी है…………आज के हालात ने देश के जीना दूभर कर दिया है गरीबी नही गरीब को मिटाने की कवायद चल रही है ,मँहगाई ने जीना मुश्किल किया हुआ है तो फिर क्यूँ हम ही हमेशा अपनी इज़्ज़त के लिये मर मिटें …………एक बार रुख से नकाब हटना ही चाहिये ताकि आने वाली पीढियों को सबक मिल सके और फिर कोई ऐसी अन्धेरगर्दी ना कर सके।
जय हिंद

Tuesday, 03 August, 2010  
Blogger पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

वन्दना जी, इस बारे में तो मैंने सोचा भी नहीं था, आपकी बात में दम है , बहुत खूब !

Tuesday, 03 August, 2010  
Blogger डॉ टी एस दराल said...

गोदियाल जी , आपने समस्या का अच्छा विश्लेषण किया है । लेकिन अब तो जो होगा , वक्त ही बताएगा ।
हमारे यहाँ एक कहावत होती है --अरे रामा , तन्ने कित कित रो ल्यूं ।

Tuesday, 03 August, 2010  
Blogger संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सही चिंतनीय मुद्दा उठाया है....देश की कहाँ किसी को फ़िक्र है....अपनी जेबें भरने से फुर्सत ही कहाँ ...सब एक दूसरे पर आरोप -प्रत्यारोप कराने में लगे हैं ....आम जनता ही इज्ज़त की फ़िक्र में दुबली हुई जा रही है ...

Tuesday, 03 August, 2010  
Blogger राज भाटिय़ा said...

इन्हरमियो को तो सिर्फ़ एक हिटलर ही सीधा कर सकता है जो इन की जडॊ कॊ भी खॊद दे, बहुत सुंदर लेकिन हकीकत लिखी आप ने , हमे शर्म आने लगी है इन की हरकतो से लेकिन इन कमीनो कॊ कोई शर्म नही. धन्यवद

Tuesday, 03 August, 2010  
Blogger लोकेन्द्र सिंह said...

बहुत दुखी और क्रोध भरे हृदय से लिखा है आपने.. होना भी चाहिए। अपनी खून-पसीना बहाकर रुपया कमाकर टैक्स जमा करके सरकारी खजाने की रौनक बनाते हैं और भ्रष्ट नेता व अफसर उसे कुछ तो यूं ही बहा देते हैं और कुछ अपनी जेब में सरका लेते हैं। देश की इज्जत तो बची ही रहनी चाहिए... हम और आपको तो उसी में थोड़ी संतुष्टि हो जाएगी।

Wednesday, 04 August, 2010  
Blogger संजय @ मो सम कौन... said...

कसौटी फ़िल्म का गाना है गोदियाल साहब,
’हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है’

पहले तो अपनी गुलामी को ही सेलीब्रेट करने वाला फ़ार्मूला हम जैसों के पल्ले नहीं पड़ता।
फ़िर यहां के तौर तरीके,हम तो पिछड़ी मानसिकता वाले ही रह गये जी। देश की इज्जत, मेहमानों के सामने, वगैरह वगैरह।
वंदना जी के कमेंट से सहमत।

गैर जिम्मेदार होने का मन कर रहा है।

Wednesday, 04 August, 2010  
Blogger अजय कुमार said...

गुलामी के प्रतीक इस स्पर्धा के आयोजन का औचित्य क्या है ???

Wednesday, 04 August, 2010  
Blogger हास्यफुहार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

Wednesday, 04 August, 2010  
Blogger honesty project democracy said...

आपकी पोस्ट भी अच्छी है लेकिन वंदना जी से मैं पूरी तरह सहमत हूँ की देश की इज्जत एक बार जानी ही चाहिए जिससे कांग्रेस के बेशर्म और भ्रष्ट नेताओं को गली-गली में नंगा किया जा सके उनके इस महान काम के लिए ,बेशर्मों की भी सीमायें होती है इनलोगों ने तो व्यवस्था को इतना सडा दिया है की बेशर्मी भी पानी-पानी हो गयी है ...

Wednesday, 04 August, 2010  
Blogger शिवम् मिश्रा said...

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

Wednesday, 04 August, 2010  
Blogger अन्तर सोहिल said...

वन्दना जी की बात सही है
लेकिन इन नेताओं पर कुछ असर पडेगा, कहा नही जा सकता।
फिर भी हम तो यही कहेंगें कि "ये आयोजन जैसे भी हो ठीक ठीक ही निपट जाए और देश की इज्ज़त पर कोई आंच न आने पाए।"

प्रणाम

Wednesday, 04 August, 2010  
Blogger Bhavesh (भावेश ) said...

गोदियाल जी, आपने बिल्कुल सही लिखा. मैं आपके इस कथन से शत प्रतिशत सहमत हूँ कि आज जर्जर हो चुका पूरा सिस्टम ही काफी हद तक जिम्मेदार है. कुछ टिप्पणीकारों ने लिखा है कि देश की इज्जत के बारे में क्यों सोचे. अफ़सोस चाहे खेल ढंग से संपन्न हो या फिर कोई हादसे के साथ, असल नुकसान तो देश का होना है न कि उन लोगो का जो इस दुर्दशा के लिए जिम्मेवार है.
अगर खेल ढंग से निपट जाते है जो सत्रह गुना खर्चे का बोझ जनता के सर, और अगर कही खुदा न खस्ता कोई हादसा हो जाता है तो देश की बदनामी जिसकी वजह से देश में इन्वेस्टमेंट कम हो जायेगा और अर्थव्यस्था की गति मंद पड़ जाने का खतरा है.
ये तो वो बात हुई, कि चाकू खरबूजे पर घिरे या खरबूजा चाकू पर काटना तो खरबूजे (देश के नागरिक) ने ही है.

Wednesday, 04 August, 2010  
Blogger arvind said...

bilkul satik sahi baat likhaa hai aapne.aapne ek ek parat khol kar rakh diya hai......jaychandon ki sankhyaa badhti hi jaa rahi hai...prithviraj kare bhi to kya...

Wednesday, 04 August, 2010  
Blogger संजय भास्‍कर said...

वन्दना जी की बात सही है

Thursday, 05 August, 2010  
Blogger Smart Indian said...

४००० करोड़ रूपये खर्च का प्रारम्भिक आंकलन अगर सत्रह गुना बढ़ जाए तो भृकुटियाँ तनना भी स्वाभाविक है!
इतना बडा अमला और ये सारा तामझाम. अगर यह भी नहीं सम्भलता तो ओलिम्पिक्स की तो बात सोचना ही बेमानी है। वैसे ऐसे आयोजन के लिये दिल्ली के अलावा देश में कोई और शहर नहीं बचा है क्या?

Thursday, 05 August, 2010  
Anonymous Anonymous said...

दूसरे देश की एजेंसिया हमें सतर्क कर रही है कि जाग जाओ कहीं कुछ बड़ी गड़बड़ चल रही है !

इस खबर का सन्दर्भ मिल सकता है? किस खुफिया एजेंसी ने किस खरत्र के प्रति हमें आगाह किया है?

Thursday, 05 August, 2010  

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