ख्वाइश !
मैंने कब ये चाहा
कि मैं भी
बहुत बड़ा 'रिच' होता,
मेरी तो बस,
इतनी सी ख्वाइश थी
ऐ जिन्दगी,
कि तुझमे भी एक
ऑन-ऑफ का स्विच होता,
जिसे मैं मन माफिक
जब 'जी' में आता,
जलाता और बुझाता।
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...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
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19 Comments:
चाह नहीं रिच हो जाऊं
और सुरबाला को कार में बिठाऊं :)
वाह!!!वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा
जब जी में आता,
जलाता बुझाता !
कुछ तो अपने
मन माफिक कर पाता !!
गजब कि पंक्तियाँ हैं ...
बहुत सुंदर रचना.... अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया...
कभी कभी हम सभी को एक स्विच की आवश्यकता महसूस होती है....
कभी कभी हम सभी को एक स्विच की आवश्यकता महसूस होती है....
यह स्विच मिल जाये तो हमें भी बता दीजियेगा।
वाह ,स्विच टू लिव ...
काश ऐसा संभव होता, मज़ा ही आ जाता..............
वाह वाह बेहतरीन पोस्ट !
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....
साँई इतना दीजिए जा में कुटुम्ब समाय!
जब जी में आता,
जलाता बुझाता !
कुछ तो अपने
मन माफिक कर पाता !!
काश ऐसा हो पाता.:)
रामराम.
ऊपरवाला स्विच ओवर का ऑप्शन नहींदेता गोदियाल जी...वैसे आपकी ख्वाहिश पूरा हो एही हमरा कामना है!!
बहुत खूब । ऑन ऑफ़ का आइडिया बढ़िया है ।
बहुत ही शानदार! फोटो भी गज़ब का है......
व्यंग्य: युवराज और विपक्ष का नाटक
ऐसा स्विच तो सभी ढूंढ रहे हैं......
गोदियाल जी, मिल जाये तो हमें भी बताना।
ऐ जिन्दगी,
कि काश !
तुझमे भी एक
ऑन-ऑफ का स्विच होता,
जब जी में आता,
जलाता बुझाता !
कुछ तो अपने
मन माफिक कर पाता !
--साथ में एक रिवर्स फारवर्ड का गियर. :)
बस अब इसी की कसर है ...स्विच ऑन ऑफ का भी आविष्कार हो ही जायेगा
sir ji, switch to aaj bhi hai, lekin kambaqt bijli aaye to sahi.
good shot
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