Tuesday, February 21, 2012

सुखांतकी !


इस रंगशाला के हम मज़ूर
कोई कुशल, कोई अकुशल, 
कोई तन-मन से,
कोई अनमन उकताया  सा,  
निभा तो रहे किन्तु सब 
अपना-अपना किरदार !
पर्दा उठते ही अभिनय शुरू  
और गिरने पर  ख़त्म !!
मगर कभी-कभी कम्वक्त
मुंह बायें खडा यक्ष-प्रश्न   
मन  उद्द्वेलित कर जाता है; 
कि क्या उचित है तब, जब 
रंगकर्मी ही  तंग आ जाए  
किरदार निभाते-निभाते;
समर्पण अथवा परित्याग ? 

11 comments:

  1. अजीब रंगमंच है ये भी जिसके निर्देशक के बारे में कोई नहीं जानता..

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  2. मगर कभी-कभी कम्वक्त
    मुंह बायें खडा यक्ष-प्रश्न
    मन उद्द्वेलित कर जाता है; ... कभी कभी नहीं , कई बार

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  3. सुख की चाह, रही सब मन में..

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  4. कोई कुशल और कोई अकुशल... कर्म जारी रहना चाहिए बस। बढिय़ा रचना।

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  5. वाह ...बहुत ही अनुपम भाव संयोजन ।

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  6. शेख पीर [अरे वही- अपने शेक्सपीयर] से प्रेरणा लेकर लिखी गई सुंदर कविता के लिए बधाई :)

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  7. किरदार निभाते-निभाते;
    समर्पण अथवा परित्याग ?
    gahan sunder abhivyakti ...

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  8. बहुत सुन्दर गंभीर और सार्थक रचना...
    सादर

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  9. मुंह बायें खडा यक्ष-प्रश्न
    मन उद्द्वेलित कर जाता है;
    कि क्या उचित है तब, जब
    रंगकर्मी ही तंग आ जाए
    किरदार निभाते-निभाते;
    समर्पण अथवा परित्याग ?


    इस भावपूर्ण रचना के लिए बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  10. कि क्या उचित है तब, जब
    रंगकर्मी ही तंग आ जाए
    किरदार निभाते-निभाते;
    समर्पण अथवा परित्याग ?

    यक्ष प्रश्न है... कई बार उठता है.

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