आजकल के अधिकाँश नेता (कुछ एक ), को छोड़कर मूर्खों की जमात के ही हैं ! सब कुछ बोलेंगे लेकिन मुद्दे पर स्थिर कभी नहीं रहते ! कब डंकी से हॉर्स पर स्विच कर ,जाते हैं पता ही नहीं लगता .
ऐसा कुछ भी ख़ास है नहीं बताने को, अपने बारे में ! बस, यों समझ लीजिये कि गुमनामी के अंधेरो में ही आधी से अधिक उम्र गुजार दी !हाँ, अपनी बात कुछ भगत सिंह जी के अंदाज में इस तरह कहूंगा ;
इन बिगड़े दिमागों में, ख्वाबों के कुछ लच्छे हैं,
हमें पागल ही रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।
साभार,
गोदियाल
My humble request is to kindly ignore the typographical errors.
My fondest wish is to inspire someone else to write something even better than I have done.
Look forward to receiving your creative suggestions.
regards,
Godiyal
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7 Comments:
दिखा पिछाड़ी जो रहा, रविकर वही अमूर्त |
दो कौड़ी में बिक गया, लेता ग्राहक धूर्त |
लेता ग्राहक धूर्त, राष्ट्रवादी यह खोता |
खोता रोता रोज, यज्ञ आदिक नहिं होता |
खुली विदेशी शॉप, खींचता उनकी गाड़ी |
बनता लोमड़ जाय, अनाड़ी दिखा पिछाड़ी ||
कार्टून कुछ नहीं, बहुत कुछ बोलता है!
आजकल के अधिकाँश नेता (कुछ एक ), को छोड़कर मूर्खों की जमात के ही हैं ! सब कुछ बोलेंगे लेकिन मुद्दे पर स्थिर कभी नहीं रहते ! कब डंकी से हॉर्स पर स्विच कर ,जाते हैं पता ही नहीं लगता .
दमदार आर्थिक सोच यहीं से लागू की जा सकती है..
Animals have been better-offs.
कमाल की प्रस्तुती
असल् बात तो यह है की मेले में एक से एक बड़े गधे आये हैं तो वे बोलेंगे क्या |वे तो एक सुर में राग अलाप सकते हैं |
आशा
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