Thursday, November 29, 2012

कार्टून कुछ बोलता है -उज्जैन का खोता मेला


Labels:

7 Comments:

Blogger रविकर said...

दिखा पिछाड़ी जो रहा, रविकर वही अमूर्त |
दो कौड़ी में बिक गया, लेता ग्राहक धूर्त |
लेता ग्राहक धूर्त, राष्ट्रवादी यह खोता |
खोता रोता रोज, यज्ञ आदिक नहिं होता |
खुली विदेशी शॉप, खींचता उनकी गाड़ी |
बनता लोमड़ जाय, अनाड़ी दिखा पिछाड़ी ||

Thursday, 29 November, 2012  
Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

कार्टून कुछ नहीं, बहुत कुछ बोलता है!

Thursday, 29 November, 2012  
Blogger ZEAL said...

आजकल के अधिकाँश नेता (कुछ एक ), को छोड़कर मूर्खों की जमात के ही हैं ! सब कुछ बोलेंगे लेकिन मुद्दे पर स्थिर कभी नहीं रहते ! कब डंकी से हॉर्स पर स्विच कर ,जाते हैं पता ही नहीं लगता .

Thursday, 29 November, 2012  
Blogger प्रवीण पाण्डेय said...

दमदार आर्थिक सोच यहीं से लागू की जा सकती है..

Friday, 30 November, 2012  
Anonymous Anonymous said...

Animals have been better-offs.

Friday, 30 November, 2012  
Blogger Rohitas Ghorela said...

कमाल की प्रस्तुती

Friday, 30 November, 2012  
Blogger Asha Lata Saxena said...

असल् बात तो यह है की मेले में एक से एक बड़े गधे आये हैं तो वे बोलेंगे क्या |वे तो एक सुर में राग अलाप सकते हैं |
आशा

Friday, 30 November, 2012  

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home