Wednesday, December 26, 2012

अपनी शान कहते थे तुझे !

आन,बान,शान, आह बिखरी,
दरिंदगी अब हर राह बिखरी। 

नजर दौड़ाता हूँ जिधर भी ,  
अस्मत और कराह बिखरी। 



चेहरे है सभी कुम्हलाये हुए, 
व्यथा-वेदना अथाह बिखरी।   

  
लुंठक लूट रहे है वाह वाही, 

चाटुकारों की सराह बिखरी।


पैरोकारी के साम्राज्य पथ पर ,   

शठ-कुटिलों की डाह बिखरी।

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8 Comments:

Blogger रश्मि प्रभा... said...

आंसू के सूखे निशान इधर भी हैं,उधर भी है

Wednesday, 26 December, 2012  
Anonymous Anonymous said...

शानदार लेखन,
जारी रहिये,
बधाई !!!

Wednesday, 26 December, 2012  
Blogger पूरण खण्डेलवाल said...

उम्दा !!!!

Wednesday, 26 December, 2012  
Blogger Kailash Sharma said...

होती दृष्ठि-गौचर है यहाँ अब,
अस्मत और कराह बिखरी।

....बहुत सटीक कथन...बहुत मर्मस्पर्शी रचना..

Wednesday, 26 December, 2012  
Blogger Arshad Ali said...

क्रूर यंत्रणा ही दिखी हरतरफ,
जिधर भी ये निगाह बिखरी।

दर्द महसूस कर मेरी आह! जब दर्दनाक रही
जरा सोंचो की कैसे उसने झेला होगा

चलो ग़ालिब की गली,मै में डूब जाने को
बाद उसके होश में आने का झमेला होगा

बहुत साफ़ चित्रण ...कलम सीधे दिल पर चली ...दर्द महसूस हुआ।

Wednesday, 26 December, 2012  
Blogger दिगम्बर नासवा said...

मर्म को छूती है स्पष्ट ओर बेबाक रचना ...

Thursday, 27 December, 2012  
Blogger प्रवीण पाण्डेय said...

सच को उधेड़ कर रख दिया है...

Friday, 28 December, 2012  
Blogger Admin said...

आपकी कविता ने इतनी साफ-साफ तस्वीर खींच दी है हमारे समाज की, जहाँ इज्जत और इंसानियत बिखरी पड़ी है और हर तरफ दर्द और तकलीफ दिख रही है। चेहरों की वह व्यथा, लूट-खसोट, और चालाकियों की बातें सच में सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि हम किस तरह की दुनिया में रह रहे हैं।

Tuesday, 30 December, 2025  

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