Saturday, February 23, 2013

गिरेवाँ में झाँकिये












पुष्प-हार क्या मिलेगा, पदत्राण खाओगे,  
जैसा बोओगे, फसल वैसी ही तो पाओगे।  

जानता हूँ कि कहना,लिखना व्यर्थ है सब,  
कब तुम इंसान थे, जो अब बन जाओगे। 

उसी के तो काबिल थे,जो हासिल हो रहा, 
सच्चाई को कब तक, फरेब से छुपाओगे। 

सम्मुख वार का हौंसला तो तुममे है नहीं,
मुल्क-फरोशों,पीठ पे ही खंजर चुभाओगे। 

हिम्मत जुटाओ, स्व-गिरेवां में झाँकने की,
गीत दमन,मुफ़लिसी के,कब तक गाओगे।  
  
आज जितना भले दूर, यथार्थ से भागिये,  
आखिर में लौट के बुद्धू,घर को ही आओगे। 

देख कुत्सित कृत्य तुम्हारे,पूछता 'परचेत',    
कायरों,लहू मासूमों का कब तक बहाओगे।      


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14 Comments:

Blogger कविता रावत said...

बेशर्मों को अपने गिरवान में झाँकने की फुर्सत कहाँ मिलती है ..
बहुत बढ़िया उम्दा रचना

Saturday, 23 February, 2013  
Blogger रविकर said...

बहुत बढ़िया -
निर्दोष गजल-
सटीक सन्देश-
आभार भाई जी ||

मासूमों के खून से, लिखते नई किताब |
पड़े लोथड़े माँस के, खाते पका कबाब |
खाते पका कबाब, पाक की कारस्तानी |
जब तक हाफिज साब, कहेंगे हिन्दुस्तानी |
तब तक सहना जुल्म, मरेंगे यूं ही भोले |
सत्ता तो है मस्त, घुटाले कर कर डोले |||

Saturday, 23 February, 2013  
Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

शिक्षाप्रद सन्देश!
कल रविवार के चर्चामंच पर भी इस पोस्ट को लिंक किया है।

Saturday, 23 February, 2013  
Blogger धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

सन्देश देती उम्दा गजल,,,बधाई

Recent post: गरीबी रेखा की खोज

Saturday, 23 February, 2013  
Blogger Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून said...

सुंदर. आप तो अच्‍छा लि‍खते ही हैं

Saturday, 23 February, 2013  
Blogger डॉ टी एस दराल said...


वस्तुत : गोदियाल ब्रांड रचना। :)
हालातों पर करारी चोट।

Saturday, 23 February, 2013  
Blogger डॉ टी एस दराल said...


वस्तुत : गोदियाल ब्रांड रचना। :)
हालातों पर करारी चोट।

Saturday, 23 February, 2013  
Blogger प्रवीण पाण्डेय said...

कोई ठोस उत्तर ही संतोष दे सकता है।

Saturday, 23 February, 2013  
Blogger ताऊ रामपुरिया said...

बिल्कुल समसामयिक सटीक गजल, बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

Saturday, 23 February, 2013  
Blogger संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

समसामयिक रचना ।

Sunday, 24 February, 2013  
Blogger Neeraj Neer said...

बहुत सुन्दर और संदेशवाही गज़ल लिखी है आपने, बधाई.
सादर
नीरज 'नीर'
कव्यसुधा

Sunday, 24 February, 2013  
Blogger वाणी गीत said...

आखिर कब तलक !!
वर्तमान को अभिव्यक्त करती है सरल शब्दों में !

Sunday, 24 February, 2013  
Blogger दिगम्बर नासवा said...

जानता हूँ कि कहना,लिखना व्यर्थ है सब,
कब तुम इंसान थे, जो अब बन जाओगे ...

बहुत खूब गौदियाल जी ... पता नहीं कब इंसान पहचान खो दे ...
सभी शेर वर्तमान पे कटाक्ष हैं ....

Sunday, 24 February, 2013  
Blogger भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

लिखा बहुत अच्छा है. लोग सुनें अन्यथा सुनने के काबिल बचेंगे इसमें संशय है.

Sunday, 24 February, 2013  

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