कैसा भैंसा किस तरफ, दाएँ बाएँ बोल | दृष्टि-दोष जग को हुआ, लगता किसका मोल | लगता किसका मोल, लगे दोनों ही तगड़े | नीयत जाए डोल, कहीं होवे ना झगड़े | राम राम हे मित्र, मिले गर ग्राहक ऐसा | बिना मोल बिक जाय, स्वयं से रविकर भैंसा |
ऐसा कुछ भी ख़ास है नहीं बताने को, अपने बारे में ! बस, यों समझ लीजिये कि गुमनामी के अंधेरो में ही आधी से अधिक उम्र गुजार दी !हाँ, अपनी बात कुछ भगत सिंह जी के अंदाज में इस तरह कहूंगा ;
इन बिगड़े दिमागों में, ख्वाबों के कुछ लच्छे हैं,
हमें पागल ही रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।
साभार,
गोदियाल
My humble request is to kindly ignore the typographical errors.
My fondest wish is to inspire someone else to write something even better than I have done.
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regards,
Godiyal
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7 Comments:
हा हा हा -
हा हा हा -
क्षमा सहित-
कैसा भैंसा किस तरफ, दाएँ बाएँ बोल |
दृष्टि-दोष जग को हुआ, लगता किसका मोल |
लगता किसका मोल, लगे दोनों ही तगड़े |
नीयत जाए डोल, कहीं होवे ना झगड़े |
राम राम हे मित्र, मिले गर ग्राहक ऐसा |
बिना मोल बिक जाय, स्वयं से रविकर भैंसा |
:):) अब तो अपनी औकात दो कौड़ी की भी नहीं है ॥
कौन पार्टी का समर्थक है ये भैंसा .
अपने से तो ये भैंसा ही अच्छा, प्रणाम इस महिषासुर को .:)
कहाँ से आया था ये भैंसा ... किसने पाल पास के इसे इस लायक बनाया ...
भैंसा करोड़ का और हम कौड़ियों के मोल ..
महिषासुर मर्दनी को लाओ .
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