Sunday, March 17, 2013

यह ज़माना भला कब था,





हो जाएगा जो अब भला, यह ज़माना भला कब था,
राज धूर्तता का ही चला, शराफत का चला कब था।

अस्मिता, अस्तित्व की, मालूम सबको है हकीकत,  
तन भले ही खोखला हो,किन्तु मन को खला कब था।


आलम देखकर दरिंदगी का ,सौम्य दिल बेचैन होते,
लहू शिष्टता का ही जल रहा,शठता का जला कब था।

दस्तूर सारे अपने - अपने, मुक़रर्र वक्त चलते गए,
उगा देख जुल्मों का सूरज,कौन पूछे ढला कब था।

पैदा हुए अधम घाव 'परचेत', सभ्यता की खाल पर,
खुरचते तो सब रहे, मरहम किसी ने मला कब था।
  

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13 Comments:

Blogger दिगम्बर नासवा said...

आलम देखकर दरिंदगी का ,सौम्य दिल बेचैन होते,
लहू शिष्टता का ही जल रहा,शठता का जला कब था..

गहरे भाव लिए ... कुछ कुछ उदासी लिए ... वार्तालाप करती है रचना ..

Sunday, 17 March, 2013  
Blogger ZEAL said...

दरिंदगी दिन-ब-दिन बढती ही जा रही है, सौम्य दिलों का लहू तो जलना ही है, अभिशप्त जो है।

Sunday, 17 March, 2013  
Blogger ताऊ रामपुरिया said...

आप आसानी से अपनी रचनाओं में दर्द, व्यंग, मार्मिकता यानि सब कुछ आसानी से उंडेल जाते हैं, बहुत शानदार रचना.

रामराम.

Sunday, 17 March, 2013  
Blogger अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

मन की गहरी अनुभूतियों को कुशलता से प्रकट किया है, हर पंक्ति को जिया है...

Sunday, 17 March, 2013  
Blogger रविकर said...

बहन बेटी बिन मिनिस्टर, सोच में कुछ भला कब था-
ब्याह से पहले हुवे सच, किन्तु माँ से पला कब था |

कर्ण दुर्योधन दुशासन, और शकुनी मिल गए हैं-
विदुर चुप रहते विषय पर, भीष्म का कुछ चला कब था |

Sunday, 17 March, 2013  
Blogger virendra sharma said...

सुनती कर्ण पुकार है, अब जा के सरकार |
सोलह के सम्बन्ध से, निश्चय हो उद्धार |

निश्चय हो उद्धार, बिना व्याही माओं के |
होंगे कर्ण अपार, कुँवारी कन्याओं के |

अट्ठारह में ब्याह, गोद में लेकर कुन्ती |
फेरे घूमे सात, उलाहन क्यूँ कर सुनती ||
बहुत खूब कही ,सही कही .अ विवाहित माताओं का देश बनेगा मेरा भारत .षोडशी कन्याओं की सहमती प्राप्त करने का नया दौर शुरू होगा .

Sunday, 17 March, 2013  
Blogger Aditya Tikku said...

behtrien-***

Sunday, 17 March, 2013  
Blogger पूरण खण्डेलवाल said...

सुन्दर और बेहतरीन प्रस्तुति !!

Sunday, 17 March, 2013  
Blogger Aditi Poonam said...

सार्थक प्रस्तुति महोदय ...
साभार....

Sunday, 17 March, 2013  
Blogger धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

उम्दा गजल,लाजबाब शेर,,,वाह वाह,,,
Recent Post: सर्वोत्तम कृषक पुरस्कार,

Sunday, 17 March, 2013  
Blogger अज़ीज़ जौनपुरी said...

सार्थक और सुन्दर रचना.हो जाएगा जो अब भला, यह ज़माना भला कब था,
राज धूर्तता का ही चला, शराफत का चला कब था।

अस्मिता, अस्तित्व की, मालूम सबको है हकीकत,
तन भले ही खोखला हो,किन्तु मन को खला कब था।

आलम देखकर दरिंदगी का ,सौम्य दिल बेचैन होते,
लहू शिष्टता का ही जल रहा,शठता का जला कब था।

दस्तूर सारे अपने - अपने, मुक़रर्र वक्त चलते गए,
उगा देखते जुल्मों का सूरज,कौन पूछे ढला कब था।

पैदा हुए अधम घाव 'परचेत', सभ्यता की खाल पर,
खुरचते तो सब रहे, मरहम किसी ने मला कब था।

Monday, 18 March, 2013  
Blogger प्रवीण पाण्डेय said...

सत्य हम पहचानते हैं,
श्रेष्ठ भी फिर माँगते हैं।

Monday, 18 March, 2013  
Blogger प्रतिभा सक्सेना said...

पर क्यों और कब तक ?

Tuesday, 19 March, 2013  

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