होते न गर तुम खुदगर्ज इतने !
दर्द-ऐ -दिल चीज क्या है,तुमने ये न हरगिज कहा होता,
एक कतरा गर सितम का, दिल ने तुम्हारे सहा होता।
ह्रदय-संवेदना की गहराइयों से, तुम यूं न होते बेखबर,
इक पुलिंदा ख्वाहिशों का, कभी आंसुओं में बहा होता।
बढ़ते न हरदम फासले, होते न गर खुदगर्ज इतने,
हुजूम नाइंसाफियों का ये सारा,यूं न इतरा रहा होता।
कर डालते घायल जिगर, तुम तोड़कर हमारा यकीं ,
बुरा जो हमने भी अगर, कभी तुम्हारा चाहा होता।
वक्त के हर वार पे ये न भूलो, ढाल बनकर हम खड़े थे,
वरना शोखियों का बुत तुम्हारा, एक पल में ढहा होता।
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12 Comments:
सुन्दर गजल !!
बढ़ते न हरदम फासले, होते न गर खुदगर्ज इतने,
हुजूम नाइंसाफियों का तुम्हारा,यूं न इतरा रहा होता।
बेहतरीन और सटीक गजल.
रामराम.
Aabhaar Ravikar ji !
अहा, बहुत सुन्दर..
बहुत खूबसूरत गजल
बहुत खुबसूरत ग़ज़ल और अभिव्यक्ति .......!!
बहुत उम्दा,सुंदर गजल ,,,वाह वाह,,,
RECENT POST : अभी भी आशा है,
सुन्दर अभिव्यक्ति!
बहुत सुन्दर..
सुन्दर अभिव्यक्ति!
bahut hi sundar wa saral bhaw
वाह सटीक
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