Tuesday, July 9, 2013

वो जो कभी वादियाँ थी !



















डर लगता है वहाँ, 
बिजलियों की  कडकड़ाहट से, 
डर लगता है अब वहाँ, 
बादलों की गडगड़ाहट से। 

वीरान हुए खण्डहरों में, 
नीरवता ही पसरी पडी है,
डर लगता है वहाँ, 
चमगादडों की फडफड़ाहट से।


फिर कोई खतरे में है, 
जो फ़ौजी फ़रिश्ते आ गए, 
डर लगता है वहाँ,
पग-बूटों की ठकठकाहट से। 

फिर न जाने किसका 
आशियाना जमींदोज हुआ,
डर लगता है वहाँ,
दरकते शैलों की धडधड़ाहट से। 

सैलाब में प्रियजन खोये,
नयनों के समक्ष जिसने,
डर लगता है वहाँ, 
उस बूढ़ी माँ की बडबड़ाहट से।    

कुछ अभागे वो पात, 
जो टूटे थे आंधी में ड़ाल से,
डर लगता है उन,
शुष्क पत्तों की खडखड़ाहट से। 

वो जो दर-किवाड़ घर के,  
बने थे उजड़े दयार से, 
डर लगता है अब उनपर,
धीमी सी खटखटाहट से।

वो सिसकिया जो गूंजती है, 
वहाँ नदी के बीहड़ो में,   
डर लगता है अब उस ,  
मुक्ति-बोध छटपटाहट से।  
     

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14 Comments:

Blogger पूरण खण्डेलवाल said...

सही कहा है आपनें चारों और दहशत व्याप्त है !!

Tuesday, 09 July, 2013  
Blogger डॉ टी एस दराल said...

टूटी सड़कें, टूटे छप्पर, टूटे मंदिर , इक दिन फिर बन जायेंगे ,
डर लगता है बेटे की बाट जोहती, दुखी माँ की फुसफुसाहट से।

मार्मिक स्थिति है गोदियाल जी ।


Tuesday, 09 July, 2013  
Blogger ताऊ रामपुरिया said...

सैलाब में प्रियजन खोये,नयनों के समक्ष जिसने,
डर लगता है वहाँ, उस बूढ़ी माँ की बडबड़ाहट से।
वो सिसकिया जो गूंजती है परचेत नदी के बीहड़ो में,
मिलेगी कब न जाने उनको, मुक्ति छटपटाहट से।

बहुत ही मार्मिक और साथ ही सटीक भी.

रामराम.

Tuesday, 09 July, 2013  
Blogger धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

वो सिसकिया जो गूंजती है परचेत नदी के बीहड़ो में,
मिलेगी कब न जाने उनको, मुक्ति छटपटाहट से।

वाह वाह !!! बहुत उम्दा गजल ,,,

RECENT POST: गुजारिश,

Tuesday, 09 July, 2013  
Blogger संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत मार्मिक और संवेदनशील रचना ..... वाकई अब तो पहाड़ पर अधिक बारिश से डर लगता है ।

Tuesday, 09 July, 2013  
Blogger Ranjana verma said...

दर्दनाक हादसा..... सुंदर अभिव्यक्ति .......!!

Wednesday, 10 July, 2013  
Blogger पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

आभार कुलदीप जी !

Wednesday, 10 July, 2013  
Blogger पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

कुछ जगहों पर की तो कमोवेश बड़ी दर्दनाक स्थिति है डा० साहब !

Wednesday, 10 July, 2013  
Blogger रविकर said...

यथावत-
बढ़िया है भाई जी |
शुभकामनायें-

Wednesday, 10 July, 2013  
Blogger कविता रावत said...

वो सिसकिया जो गूंजती है परचेत नदी के बीहड़ो में,
मिलेगी कब न जाने उनको, मुक्ति छटपटाहट से।
..बहुत मार्मिक चित्रण .....ऐसे दुखद क्षणों में कुछ कहने नहीं बनता ..

Wednesday, 10 July, 2013  
Blogger प्रवीण पाण्डेय said...

सारे दृश्य एक दुखद अध्याय बाँच रहे हैं।

Wednesday, 10 July, 2013  
Blogger Harihar (विकेश कुमार बडोला) said...

मन खिन्‍न है श्रीमान। आपने गहरा मर्म प्रस्‍तुत कर दिया आपदा उपरान्‍त का, पढ़ कर विचित्र लगता है।

Wednesday, 10 July, 2013  
Blogger Dr. Shorya said...

एक सिहरन सी फ़ैल गयी, बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति

Friday, 12 July, 2013  
Blogger Kailash meena said...

वीरान हुए खण्डहरों में,
नीरवता ही पसरी पडी है,
डर लगता है वहाँ,
चमगादडों की फडफड़ाहट से।

Tuesday, 09 November, 2021  

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