वो जो कभी वादियाँ थी !
डर लगता है वहाँ,
बिजलियों की कडकड़ाहट से,
डर लगता है अब वहाँ,
बादलों की गडगड़ाहट से।
वीरान हुए खण्डहरों में,
नीरवता ही पसरी पडी है,
डर लगता है वहाँ,
चमगादडों की फडफड़ाहट से।
फिर कोई खतरे में है,
जो फ़ौजी फ़रिश्ते आ गए,
जो फ़ौजी फ़रिश्ते आ गए,
डर लगता है वहाँ,
पग-बूटों की ठकठकाहट से।
पग-बूटों की ठकठकाहट से।
फिर न जाने किसका
आशियाना जमींदोज हुआ,
आशियाना जमींदोज हुआ,
डर लगता है वहाँ,
दरकते शैलों की धडधड़ाहट से।
दरकते शैलों की धडधड़ाहट से।
सैलाब में प्रियजन खोये,
नयनों के समक्ष जिसने,
नयनों के समक्ष जिसने,
डर लगता है वहाँ,
उस बूढ़ी माँ की बडबड़ाहट से।
उस बूढ़ी माँ की बडबड़ाहट से।
कुछ अभागे वो पात,
जो टूटे थे आंधी में ड़ाल से,
जो टूटे थे आंधी में ड़ाल से,
डर लगता है उन,
शुष्क पत्तों की खडखड़ाहट से।
शुष्क पत्तों की खडखड़ाहट से।
वो जो दर-किवाड़ घर के,
बने थे उजड़े दयार से,
बने थे उजड़े दयार से,
डर लगता है अब उनपर,
धीमी सी खटखटाहट से।
धीमी सी खटखटाहट से।
वो सिसकिया जो गूंजती है,
वहाँ नदी के बीहड़ो में,
वहाँ नदी के बीहड़ो में,
डर लगता है अब उस ,
मुक्ति-बोध छटपटाहट से।
मुक्ति-बोध छटपटाहट से।
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14 Comments:
सही कहा है आपनें चारों और दहशत व्याप्त है !!
टूटी सड़कें, टूटे छप्पर, टूटे मंदिर , इक दिन फिर बन जायेंगे ,
डर लगता है बेटे की बाट जोहती, दुखी माँ की फुसफुसाहट से।
मार्मिक स्थिति है गोदियाल जी ।
सैलाब में प्रियजन खोये,नयनों के समक्ष जिसने,
डर लगता है वहाँ, उस बूढ़ी माँ की बडबड़ाहट से।
वो सिसकिया जो गूंजती है परचेत नदी के बीहड़ो में,
मिलेगी कब न जाने उनको, मुक्ति छटपटाहट से।
बहुत ही मार्मिक और साथ ही सटीक भी.
रामराम.
वो सिसकिया जो गूंजती है परचेत नदी के बीहड़ो में,
मिलेगी कब न जाने उनको, मुक्ति छटपटाहट से।
वाह वाह !!! बहुत उम्दा गजल ,,,
RECENT POST: गुजारिश,
बहुत मार्मिक और संवेदनशील रचना ..... वाकई अब तो पहाड़ पर अधिक बारिश से डर लगता है ।
दर्दनाक हादसा..... सुंदर अभिव्यक्ति .......!!
आभार कुलदीप जी !
कुछ जगहों पर की तो कमोवेश बड़ी दर्दनाक स्थिति है डा० साहब !
यथावत-
बढ़िया है भाई जी |
शुभकामनायें-
वो सिसकिया जो गूंजती है परचेत नदी के बीहड़ो में,
मिलेगी कब न जाने उनको, मुक्ति छटपटाहट से।
..बहुत मार्मिक चित्रण .....ऐसे दुखद क्षणों में कुछ कहने नहीं बनता ..
सारे दृश्य एक दुखद अध्याय बाँच रहे हैं।
मन खिन्न है श्रीमान। आपने गहरा मर्म प्रस्तुत कर दिया आपदा उपरान्त का, पढ़ कर विचित्र लगता है।
एक सिहरन सी फ़ैल गयी, बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति
वीरान हुए खण्डहरों में,
नीरवता ही पसरी पडी है,
डर लगता है वहाँ,
चमगादडों की फडफड़ाहट से।
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