Thursday, December 10, 2009

जोकर !


वह सर्कस का जोकर,
तमाम किरदारों के मध्य,
एक अजीबो-गरीब किरदार,
मकसद सिर्फ़ और सिर्फ़
दर्शकों को हंसाना,
उनका मनोरंजन करना,
और खुद की शख्सियत
सर्कस के जानवरों से भी कम ।
जोकर जो ठहरा,
आम नजरों मे
उसकी अहमियत इतनी
कि बस उसे
एक भावना-विहीन,
नट्खट अन्दाज का
रोल अदा करने वाला,
प्राणी मात्र समझते है हम ।।

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9 Comments:

Blogger vandana gupta said...

bahut hi bakhubi se dard ko undela hai.

Thursday, 10 December, 2009  
Blogger स्वप्न मञ्जूषा said...

कहता है जोकर सारा ज़माना
आधा हकीक़त आधा फसाना...

और सर्द रातों का दर्द से अपना ही एक अलग सा रिश्ता होता है शायद..
बहुत खूब लिखा है आपने...
गोदियाल साहब... दिनों दिन आपके अन्दर का कवि निखरता ही जा रहा है..
बात क्या है....??
मौसम बदल रहा है.... या आप बदल रहे हैं ..???

Thursday, 10 December, 2009  
Blogger अवधिया चाचा said...

बहुत खूब, लेकिन वह जोकर इतना अहम है उसपर कविता लिखी जा रही है, खेर, अवध कवि सम्‍मेलन में जाना हो तो सूचित किजिएगा, अब दो ही तमन्‍ना हैं एक आपसे आपकी कविता सुनने की दूसरे अवध देखने की, आदाब

अवधिया चाचा
जो कभी अवध्‍ा न गया

Thursday, 10 December, 2009  
Blogger मनोज कुमार said...

सर्कस का जोकर,
पर लिखी यह कविता काफी मर्मस्पर्शी बन पड़ी है।

Thursday, 10 December, 2009  
Blogger M VERMA said...

जोकर का किरदार वाकई अद्भुत है. इसके दर्द को बखूबी पहचाना है आपने

Friday, 11 December, 2009  
Blogger Pratik Maheshwari said...

राज कपूर के "जोकर" से प्रभावित और दुःख को बयान करती..
बढ़िया!

कुछ अपने मन की

Friday, 11 December, 2009  
Blogger संजय भास्‍कर said...

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

Friday, 11 December, 2009  
Blogger डॉ टी एस दराल said...

इन्सान वही जो अपना दर्द छुपाकर दूसरो को हँसता रहे।
बहुत अच्छी रचना।

Friday, 11 December, 2009  
Blogger Unknown said...

life hi jokar jaisi hai. bas koshish karte hain ki doosro ko khush rakhe chahe office ho ya ghar. hum apni jindigi jite hi kaha hai bhai....

Wednesday, 16 December, 2009  

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