Saturday, March 12, 2011

प्रकृति और मानव निर्मित त्रासदी की बढ़ती खतरनाक सहभागिता से सबक लेने की जरुरत !

जहां एक ओर जापान की इस ताजा भयंकर और दुखद प्राकृतिक आपदा ने समस्त प्राणी-जगत को एक सन्देश साफ़तौर पर दे डाला है कि मनुष्य अपनी कौशलता और सफलता के जितने मर्जी परचम लहराने का दावा कर ले, मगर उसका तथा धरा पर मौजूद अन्य प्राणियों का जीवन विकास प्रकृति की कृपा पर पूर्णतया निर्भर है, और रहेगा! जो लोग ये सोचते है कि वे इस धरा पर जितनी मर्जी मानव-बस्तियां बसा सकते है, जितने मर्जी जीवित रहने के वैकल्पिक स्रोत पैदा कर सकते है, इंसान को अमर बना सकते है, वे सरासर किसी गलतफहमी का शिकार है! वहीं दूसरी ओर प्रकृति ने मानव सभ्यता को यह भी चेताया है कि आपस में कोलेबोरेशन और सांठ-गाँठ न सिर्फ मनुष्य को ही अपितु प्रकृति को भी करना आता है, और वह मानव द्वारा खुद के लिए खोदी गई खाई के साथ मिलकर किसतरह अपनी विनाश लीला का सर्वांगीण विकास कर सकता है, जापान उसका जीता जागता उदाहरण है !

परसों और कल जहां एक तरह जापान ने दो-दो प्राकृतिक आपदाओं यानि ८.९ तीव्रता के भूकंप और प्रशांत महासागर में उठी तेज ३० फिट ऊँची सूनामी लहरों ( मुझे तो इसके नाम पर भी आपत्ति है, पता नहीं किस बेवकूफ ने इसका नाम सूनामी रखा जबकि इसका सही नाम कूनामी होना चाहिए था ) का तांडव झेला, वही तीसरी आपदा के रूप में परमाणु बिजली प्राप्त करने हेतु जापान द्वारा लगाए गए पांच परमाणु रिएक्टरों और दो परमाणु बिजलीघरों को भूकंप के तेज झटकों की वजह से तुरंत बंद कर दिया गया था, लेकिन फुकुशिमा स्थित एक रिएक्टर के पप्पिंग प्लांट में भारतीय समय के अनुसार दोपहर करीब बारह बजे जबरदस्त विस्फोट हो जाने की वजह से अफरातफरी का माहौल बन गया! हालांकि अभी तक की ख़बरों के मुताविक स्थिति बहुत ज्यादा चिंतनीय नहीं है मगर वैज्ञानिकों का कहना है कि अत्यधिक तापमान के कारण रिएक्टर के पिघलने और विकिरण का ख़तरा बना हुआ है ! और इसे हम दो प्राकृतिक आपदाओं द्वारा मानव निर्मित आपदा के साथ सांठ-गाँठ की संज्ञा दे सकते है!

एक ओर चाहे वह चीन और उत्तरकोरिया से बढ़ता परमाणु ख़तरा ही क्यों न हो, मगर इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता कि जापान हमेशा से एक तीव्र भूकंप प्रभावित और संभावित क्षेत्र रहा है ! वहीं दूसरी ओर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान दोहरी परमाणु मार झेल चुका यह देश कैसे अपने यहाँ इतना प्लूटोनियम इक्कट्ठा करके रखने की हिमाकत कर सकता है? वह बम तो सिर्फ ५ किलो प्लूटोनियम का था जबकि आज जापान खुद के तकरीबन ४५ टन प्लूटोनियम के ढेर पर बैठा है! यह जानते हुए भी कि कभी भी ऐसी सूनामी आ सकती है, कैसे यह देश अपने समुद्री तटों पर अमेरिकी परमाणु पोतो को आमंत्रित कर सकता है, जापान की हुकूमत को इस पर गंभीर चिंतन की जरुरत है! हम भगवान् से तो यही प्रार्थना करते है कि विकिरण कम से कम हो, मगर यह कहानी अभी यहीं ख़त्म नहीं हुई, ख़बरों के मुताविक जब यह विस्फोट हुआ और आपात परिस्थितियों में आस-पास की आवादी को वहाँ की सरकार ने इलाके को खाली करने के आदेश दिए तो उस इलाके से दूर भागते लोग सड़कों पर फँस गए है, क्योंकि हर कोई अपना वाहन लेकर वहाँ से दूर चले जाने को सड़क पर आ गया, और परिणामस्वरूप सड़कों पर लम्बे जाम लग गए है ! यानि कुल मिलाकर स्थिति यह है कि लोग चाहकर भी बचने का प्रयास नहीं कर सकते !

आइये अब इन सब बातों का विश्लेषण हम भारतीय परिपेक्ष में करने की कोशिश करे ! जापान एक कम आवादी वाला छोटा सा देश है, तब भी अभी तक करीब १६०० लोगो के मारे जाने और दस हजार के लापता होने की पुष्ठि हुई है, भगवान् न करे लेकिन कल्पना कीजिये कि यह अगर हमारे यहाँ हुआ होता तो मंजर क्या होता ? २६ दिसंबर २००४ की सूनामी की विनाशलीला अभी बहुत पुरानी बात नहीं हुई! खैर, जहां हम प्रकृति के इस हथियार के आगे वेबश है, वहीं हमें भी इस घटना के बाद कुछ गंभीर चिंतन की आवश्यकता आन पडी है! ज्यादा दूर न जाकर मैं दिल्ली और एनसीआर की ही बात करूंगा, जहां चार करोड़ से ज्यादा की आवादी निवास करती है! और हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि नरोरा स्थित परमाणु प्लांट बहुत दूर नहीं है! अगर कुछ ऐसी अनहोनी हो गई तो कहाँ जायेंगे, जब भागने के लिए सड़क ही नहीं मिलेगी ? पाकिस्तान हमारे बहुत करीब पंजाब प्रांत में अपना चौथा रिएक्टर लगा रहा है, जिस देश में कुछ भी नियंत्रण में नहीं रहता ', सोचिये कि कभी उनके जिहादियों ने उस रिएक्टर को उड़ाने की कोशिश की तो क्या उसके विकिरण से हम बच पायेंगे ? इन घटनाओं से इस मानव सभ्यता को कुछ सबक तो अवश्य ही लेने होंगे वरना ऊपर वाला ही मालिक है !

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16 Comments:

Blogger Sunil Kumar said...

sahi kaha aapne ham is tarah prakrati se khibad karte rahi to upar vala bhi mana kar dega

Saturday, 12 March, 2011  
Blogger संजय @ मो सम कौन... said...

जबरदस्त विश्लेषण किया है गोदियाल साहब, लेकिन सोचने की फ़ुर्सत किसे है...

Saturday, 12 March, 2011  
Blogger राज भाटिय़ा said...

गोदियाल साहब आप ने अपने इस लेख मे बहुत सुंदर बाते लिखी मे एक एक बात से सहमत हुं, अब पुरे युरोप ओर कनाडा अमेरिका मे परमाणु प्लांट धीरे धीरे बंद हो रहे हे, हमारे जर्मन मे कई परमाणु प्लांट बंद हो चुके हे, बाकी लोग सरकार के पीछे पडे हे बंद करने के लिये, बिजली हम हवा से, पानी से ओर भी बहुत से तरीके हे प्राप्त कर सकते हे, लेकिन हमारी सरकार ने अमेरिका से परमाणु प्लांट का समझोता कर के उन का कुडा करकट इकट्ठा कर के जनता के लिये क्या अच्छा किया हे?यह बात कई बार दिमाग मे उठती हे, लेकिन आज आप का यह सुंदर विश्लेषण देख कर अपने को रोक नही पाया.... अगर कभी हमारे यहां ऎसा हो जाये तो क्या सरकार जनता का हित कर पायेगी? या भोपाल कांड जेसे लोगो को मरने तडपने के लिये छोड देगी, इस से दुर भागने के लिये क्या हमारी सरकार सडके, बसे, ओर रेल गाडिया मोजूद करा सकेगी?...

Sunday, 13 March, 2011  
Blogger Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून said...

एक दम सहमत कि हमारे यहां तो ऊपर वाला ही मालिक है

Sunday, 13 March, 2011  
Blogger Udan Tashtari said...

एकदम सार्थक बात कही....कुछ सबक ले लें तो ही बेहतर!!

Sunday, 13 March, 2011  
Blogger  डॉ. मोनिका शर्मा said...

बहुत सार्थक और संवेदनशील विषय पर बात की है आपने..... हमारे यहाँ शायद ही कोई चेते ......

Sunday, 13 March, 2011  
Blogger डॉ टी एस दराल said...

बेशक हम परमाणु रुपी बारूद के ढेर पर बैठे हैं ।
इन्सान ने अपने विध्वंश का सामान खुद ही जुटा रखा है ।
शायद एक दिन महाप्रलय इसी तरह से आयेगी ।

Sunday, 13 March, 2011  
Blogger vijai Rajbali Mathur said...

गोदियाल सा:सुनामी शब्द जापानी भाषा का है जिसका अर्थ है=वायु वेग से उठी पानी की लहरें जो वास्तव में हैं ही अतः नाम बिलकुल सही है.
आपकी मानवीय संवेदनाएं सराहनीय हैं.हम सब को सचेत होकर प्रकृति से ताल-मेल और इंसानों का आपस में मेल-जोल बैठना चाहिए.

Sunday, 13 March, 2011  
Blogger M VERMA said...

सार्थक प्रश्न उकेरती पोस्ट
प्रकृति से तालमेल की कमी ही इन महाविनाशकारी आपदाओं का कारण है

Sunday, 13 March, 2011  
Blogger प्रवीण पाण्डेय said...

इतनी अधिक तीव्रता का भूकंप यदि हमारे यहाँ आता तो लाखों में क्षति होती।

Sunday, 13 March, 2011  
Blogger Patali-The-Village said...

हिंदुस्तान का तो उप्पर वाला ही मालिक है| धन्यवाद|

Sunday, 13 March, 2011  
Blogger vandana gupta said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (14-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

Sunday, 13 March, 2011  
Blogger ताऊ रामपुरिया said...

बिल्कुल सटीक बात, कुछ भी संदेह नही है.

रामराम.

Sunday, 13 March, 2011  
Blogger अन्तर सोहिल said...

आम भारतीय तो आज भी भगवान भरोसे ही जी रहा है।

प्रणाम

Sunday, 13 March, 2011  
Blogger Dr (Miss) Sharad Singh said...

कुछ सबक तो अवश्य ही लेने होंगे ...

सार्थक ... विचारोत्तेजक आलेख ....

Monday, 14 March, 2011  
Blogger संजय भास्‍कर said...

सार्थक बात कही

Monday, 14 March, 2011  

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