Saturday, March 5, 2011

अजनबियों पर यूं न इस तरह तुम !




अजनबियों पर यूं न इसतरह, सब कुछ वारा-न्यारा करों,
दुनिया रंग-रंगीली है पगली, कनखियों से न निहारा करो।  

प्यार करना जिन्हें आता नहीं, प्रेम भी उनको भाता नहीं,
छज्जे में आकर, पल्लू हिलाकर, हर वक्त न इशारा करो।    

जो हम तुम्हें देखें न देखे, तुम रहो सदा बेपरवाह होकर,  
शीशे को ही आशिक समझकर, गेसुयें तुम सवारा करों।  

तन्हाई में ख़्वाबों में खोकर,यादों में न दिल पिघलाओ,
ख्याल बुनते हुए ऐसे उनींदी न ही रतियन गुजारा करो. 

दुनिया रंग-रंगीली है पगली....         !

20 comments:

  1. आज तो बहुत प्यारा गीत लगाया है!
    पढ़कर आनन्द आ गया!

    ReplyDelete
  2. प्यार क्या है, किसी को आता नहीं,
    बेवफ़ा जहां को तो प्रेम भाता नहीं,
    बहरा नहीं कोई तेरे इस शहर में,
    नाम लेकर तुम यूं न पुकारा करो..
    अजनबियों पर यूं न इस तरह तुम....!

    वाह बहुत ही शानदार, शुभकामनाएं.

    रामराम.

    ReplyDelete
  3. न जाने किस अजनबी के द्वार पर,
    प्यार का उद्दाम सा सागर छिपा है।

    ReplyDelete
  4. अजनबियों पर यूं न इस तरह तुम,
    अपना सब कुछ वारा-न्यारा करों,
    दुनिया बड़ी रंग-रंगीली है पगली,
    इसे कनखियों से न निहारा करो.
    अजनबियों पर यूं न इस तरह तुम....
    हमें तो यह पसंद आया बहुत खूब वाह वाह ..

    ReplyDelete
  5. सुन्दर प्यार भरा गीत ।

    ReplyDelete
  6. वाह जी बहुत सुंदर

    ReplyDelete
  7. प्यार क्या है, किसी को आता नहीं,
    बेवफ़ा जहां को तो प्रेम भाता नहीं,
    बहरा नहीं कोई तेरे इस शहर में,
    नाम लेकर तुम यूं न पुकारा करो..
    अजनबियों पर यूं न इस तरह तुम....!

    सच है जी दुनिया को प्रेम की भाषा आती कहॉ है।

    ReplyDelete
  8. समझाईश से परिपूर्ण आनन्ददायक प्रस्तुति...

    ReplyDelete
  9. बहुत सुंदर रचना, ओर सत्य एक पंजाबी का गीत याद आ गया... जी करदा ऎ ऎस दुनिया नूं मे हट के ठोकर मार देया...धन्यवाद

    ReplyDelete
  10. गोदियाल साहब, अगर ऐसा हो गया तो हम जैसों का क्या होगा जो पूरा दिन उन्हीं के पीछे पीछे गुजार देते हैं। मेरा भी तो फिक्र किया होता।

    ReplyDelete
  11. बहुत सुन्दर गीत, महाराज!!

    ReplyDelete
  12. अजनबियों पर यूँ न वारा न्यारा करो ...
    मगर पहली बार तो सभी अजनबी ही होते हैं ...
    अच्छा गीत !

    ReplyDelete
  13. अक्सर ही घर के छज्जे में आकर,
    दुपट्टे का पल्लू हौले-हौले हिलाकर,
    शीशे को तसदीका आशिक बनाकर,
    यूँ न गेसुओं को अपनी सवारा करों....

    बहुत खूब ... क्या कहने हैं ... मजा अ गया ...

    ReplyDelete
  14. एक दिन में दो पोस्ट -एक आग और एक बर्फ ?

    ReplyDelete
  15. अजीब शर्त है बुनियाद-ए-दोस्ति के लिए
    कि एक अजनबी की ज़रूरत है अजनबी के लिए :)

    ReplyDelete
  16. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 08-03 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

    ReplyDelete
  17. बहुत प्यारा गीत...अंतस को छू गया..

    ReplyDelete
  18. achchhi kavita
    http://kavyana.blogspot.com/2011/03/blog-post_31.html

    ReplyDelete

मैट्रो के डिब्बों में 'आसन व्यवस्था' की नई परिकल्पना !

मैट्रो के डिब्बों में 'आसन व्यवस्था' की नई परिकल्पना ! (New concept of 'seating arrangement' in Metro coaches ! ) ...