Thursday, September 13, 2012

व्यथा !










सुन दरी !
मुझे फ़िक्र है तेरी ,
इक तू ही तो 
बिछोने का इकलौता 
सहारा थी मेरी।  

मेरी मुसीबत ,
परेशानिया तबसे 
अथाह  हुई , 
जबसे तू अचानक 
गुम राह हुई।   

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14 Comments:

Blogger देवेन्द्र पाण्डेय said...

पता नहीं आपने क्या सोच कर लिखा लेकिन नाराज न हों मैं इस पर थोड़ा विनोद करना चाहता हूँ...

सुन दरी!
अच्छा किया जो गुम हुई!
तुम्हारे मालिक को
तुम्हारी नहीं
बिस्तर की चिंता थी
तुम
बचाती थी हमेशा उन्हें सीत से
वरना बिस्तर की अकेले क्या औकात?

सुन दरी!
यह तो पूछ अपने मालिक से
कि मैं जब सहारा थी सिर्फ बिस्तर की
तो आपके पेट में इतना दर्द क्यों हो रहा है?

सुन दरी!
यह भी कह दे
कि जब नहीं थी मैं तेरी कोई
तो क्या फर्क पड़ता है
कि मैं हम बिस्तर रहूँ
किसी के भी।
:)

Thursday, 13 September, 2012  
Blogger virendra sharma said...

सुन दरी !
बिछोने का इक तू ही तो
अकेला सहारा थी मेरी,
बाजुओं में दबाये
लिए फिरता था मैं तुझे
सुबह से शाम,
इस पार से उस पार,
इस राह से उस राह !
बेचैन हूँ तबसे बड़ा,
जबसे तू अचानक
गुम राह हुई !!

बढ़िया प्रस्तुति है .

व्यंग्य थोड़ा मैं भी करूँ -

दरी को भी कुछ न कुछ तो गर्म बिस्तर चाहिए ,
इक साफ़ चादर चाहिए ..
ram ram bhai
बृहस्पतिवार, 13 सितम्बर 2012
आलमी होचुकी है रहीमा की तपेदिक व्यथा -कथा (आखिरी किश्त )

http://veerubhai1947.blogspot.com/

Thursday, 13 September, 2012  
Blogger प्रवीण पाण्डेय said...

अब तो सोफे में बैठने लगे हैं।

Thursday, 13 September, 2012  
Blogger Rajesh Kumari said...

कुछ ज्यादा ही परवाह करना या परवाह बिलकुल न करना दोनों परिस्थितियाँ गुमराही का कारण बन सकती हैं अब आपकी दरी के पीछे तो मुझे पहलेवाला कारण ही लगता है कंही आपकी बाहों में उसका दम तो नहीं घुटने लगा था

Thursday, 13 September, 2012  
Blogger पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

@ देवेन्द्र पाण्डेय जी और राजेश कुमारी जी :)

Thursday, 13 September, 2012  
Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सार्थक!

Thursday, 13 September, 2012  
Blogger ghughutibasuti said...

बेचारी दरी! अब तक मनुष्य गुमराह होते थे अब दरी भी!

घुघूती बासूती

Thursday, 13 September, 2012  
Blogger शूरवीर रावत said...

दरी को माध्यम बनाकर एक ठोस अभिव्यक्ति.

Thursday, 13 September, 2012  
Blogger Udan Tashtari said...

उतनी भी गुमराह नहीं है...खोजो प्लीज़..मुझे भी इन्तजार है!!

Friday, 14 September, 2012  
Blogger Shah Nawaz said...

दरी-चादर की जगह आजकल सोफों-कालीनो ने ले लिए हैं....

Friday, 14 September, 2012  
Blogger सदा said...

गहन भाव लिए उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति

Friday, 14 September, 2012  
Blogger दिगम्बर नासवा said...

मैं जानता हूँ दरी
तुम गुम हो गयीं ..

शायद मेरे से ज्यादा
उन्हें जरूरत थी तेरी
जिनका सब कुछ छीन लिया था
व्यवस्था के ठेकेदारों ने ..

तुझे ढूंढ लूँगा उन सभी के घर
जो शिकार हो चुके हैं
सांसों के फेर से आज़ाद हो चुके हैं ..

Friday, 14 September, 2012  
Blogger संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

दरी बेचारी क्या गुमराह होगी ..... वो तो गुम हो चुकी है ...

Friday, 14 September, 2012  
Blogger ANULATA RAJ NAIR said...

अब तो धरती मैया का सहारा है बस.....
:)
अनु

Friday, 14 September, 2012  

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