Thursday, September 13, 2012

व्यथा !










सुन दरी !
मुझे फ़िक्र है तेरी ,
इक तू ही तो 
बिछोने का इकलौता 
सहारा थी मेरी।  

मेरी मुसीबत ,
परेशानिया तबसे 
अथाह  हुई , 
जबसे तू अचानक 
गुम राह हुई।   

15 comments:

  1. पता नहीं आपने क्या सोच कर लिखा लेकिन नाराज न हों मैं इस पर थोड़ा विनोद करना चाहता हूँ...

    सुन दरी!
    अच्छा किया जो गुम हुई!
    तुम्हारे मालिक को
    तुम्हारी नहीं
    बिस्तर की चिंता थी
    तुम
    बचाती थी हमेशा उन्हें सीत से
    वरना बिस्तर की अकेले क्या औकात?

    सुन दरी!
    यह तो पूछ अपने मालिक से
    कि मैं जब सहारा थी सिर्फ बिस्तर की
    तो आपके पेट में इतना दर्द क्यों हो रहा है?

    सुन दरी!
    यह भी कह दे
    कि जब नहीं थी मैं तेरी कोई
    तो क्या फर्क पड़ता है
    कि मैं हम बिस्तर रहूँ
    किसी के भी।
    :)

    ReplyDelete
  2. सुन दरी !
    बिछोने का इक तू ही तो
    अकेला सहारा थी मेरी,
    बाजुओं में दबाये
    लिए फिरता था मैं तुझे
    सुबह से शाम,
    इस पार से उस पार,
    इस राह से उस राह !
    बेचैन हूँ तबसे बड़ा,
    जबसे तू अचानक
    गुम राह हुई !!

    बढ़िया प्रस्तुति है .

    व्यंग्य थोड़ा मैं भी करूँ -

    दरी को भी कुछ न कुछ तो गर्म बिस्तर चाहिए ,
    इक साफ़ चादर चाहिए ..
    ram ram bhai
    बृहस्पतिवार, 13 सितम्बर 2012
    आलमी होचुकी है रहीमा की तपेदिक व्यथा -कथा (आखिरी किश्त )

    http://veerubhai1947.blogspot.com/

    ReplyDelete
  3. अब तो सोफे में बैठने लगे हैं।

    ReplyDelete
  4. कुछ ज्यादा ही परवाह करना या परवाह बिलकुल न करना दोनों परिस्थितियाँ गुमराही का कारण बन सकती हैं अब आपकी दरी के पीछे तो मुझे पहलेवाला कारण ही लगता है कंही आपकी बाहों में उसका दम तो नहीं घुटने लगा था

    ReplyDelete
  5. @ देवेन्द्र पाण्डेय जी और राजेश कुमारी जी :)

    ReplyDelete
  6. उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

    ReplyDelete
  7. बेचारी दरी! अब तक मनुष्य गुमराह होते थे अब दरी भी!

    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
  8. दरी को माध्यम बनाकर एक ठोस अभिव्यक्ति.

    ReplyDelete
  9. उतनी भी गुमराह नहीं है...खोजो प्लीज़..मुझे भी इन्तजार है!!

    ReplyDelete
  10. दरी-चादर की जगह आजकल सोफों-कालीनो ने ले लिए हैं....

    ReplyDelete
  11. गहन भाव लिए उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति

    ReplyDelete
  12. मैं जानता हूँ दरी
    तुम गुम हो गयीं ..

    शायद मेरे से ज्यादा
    उन्हें जरूरत थी तेरी
    जिनका सब कुछ छीन लिया था
    व्यवस्था के ठेकेदारों ने ..

    तुझे ढूंढ लूँगा उन सभी के घर
    जो शिकार हो चुके हैं
    सांसों के फेर से आज़ाद हो चुके हैं ..

    ReplyDelete
  13. दरी बेचारी क्या गुमराह होगी ..... वो तो गुम हो चुकी है ...

    ReplyDelete
  14. अब तो धरती मैया का सहारा है बस.....
    :)
    अनु

    ReplyDelete

ब्लॉगिंग दिवस !

जब मालूम हुआ तो कुछ ऐसे करवट बदली, जिंदगी उबाऊ ने, शुरू किया नश्वर में स्वर भरना, सभी ब्लॉगर बहिण, भाऊ ने,  निष्क्रिय,सक्रिय सब ...