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Showing posts from February, 2019

आत्ममंथन !

बस, आज  कुछ नहीं कहने का क्योंकि आज अवसर है शूरवीरो की पावन सरजमीं के  बंदीगृह के बंदियों से,  कुछ सीख लेने का ।

गरीबी और रेखा !

तमाम जिन्दगी की मुश्किलों से तंग आकर, आत्महत्या का ख्याल  अपने बोझिल मन मे लिए, मुम्बई की 'गरीबी'  'जुहू बीच' के समन्दर पर  पहुंची ही थी कि वहां उसे श्रृगांरमय 'रेखा' नजर आ गई, तज ख्याल, ठान ली जीने की फटेहाल।  : : शायद इसी को "पोजेटिव सोच" कहते हैं??....😊

बडा सवाल !

कार्य निर्विघ्न अमनसेतु का शुरू हो, इसी इंतजार मे भील हैं, सिरे सेतु के कहांं से कहांं जोडें, असमंजस मे नल-नील हैं। तमाम कोशिशें खारे समन्दर मे, मीठे जल की तलाश जैसी, पथ कंटक भरा, तय होने अभी असंख्य श्रमसाध्य मील हैं। नि:सन्देह रावण भी आज, लज्जित महसूस कर रहा होगा, कुंठित कायरपन से अग्रज अपदूतों के, हो रहे जलील हैं। खुबसूरत जमीं को दरकिनार कर,आरजू है जन्नत पाने की, हुरों के चक्कर मे किए जा रहे, सभी कारनामेंं अश्लील हैं। विकट प्रसंग, मनन का यह भी मुंंह बाये खडा है  'परचेत', कटु,उग्र वृत्ति के आगे क्यों असहाय, शिष्टता और शील हैं।

मंथन !

पात-डालियों की जिस्मानी मुहब्बत,अब रुहानी हो गई, मौन कूढती रही जो ऋतु भर, वो जंग जुबानी हो गई। बोल गर्मी खा गये पातियों के,देख पतझड़ को मुंडेर पर, चेहरों पे जमी थी जो तुषार, अब वो पानी-पानी हो गई। सृजन की वो कथा जिसे,सृष्टिपोषक सालभर लिखते रहे, पश्चिमी विक्षोभ की नमी से पल मे, खत्म कहानी हो गई। बसन्ती मुनिया अभी परस़ों जिसे,ग्रीष्म ने खिलाया गोद मे, देने हिदायतों की होड़ मे, अब वो उसी की नानी हो गई। न कर फिर उसे स्याह से रंगने की कोशिश, ऐ 'परचेत', जमाने के वास्ते जो खबर, अब बहुत पुरानी हो गई।

मटमैला इल्म़ !

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