कार्य निर्विघ्न अमनसेतु का शुरू हो, इसी इंतजार मे भील हैं, सिरे सेतु के कहांं से कहांं जोडें, असमंजस मे नल-नील हैं। तमाम कोशिशें खारे समन्दर मे, मीठे जल की तलाश जैसी, पथ कंटक भरा, तय होने अभी असंख्य श्रमसाध्य मील हैं। नि:सन्देह रावण भी आज, लज्जित महसूस कर रहा होगा, कुंठित कायरपन से अग्रज अपदूतों के, हो रहे जलील हैं। खुबसूरत जमीं को दरकिनार कर,आरजू है जन्नत पाने की, हुरों के चक्कर मे किए जा रहे, सभी कारनामेंं अश्लील हैं। विकट प्रसंग, मनन का यह भी मुंंह बाये खडा है 'परचेत', कटु,उग्र वृत्ति के आगे क्यों असहाय, शिष्टता और शील हैं।