Tuesday, May 3, 2016

अनलमय देव-भूमि


4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (04-05-2016) को "सुलगता सवेरा-पिघलती शाम" (चर्चा अंक-2332) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  2. बहुत संवेदनशील रचना ... पहाड़ों का दर्द किसी ने नहीं समझा ...

    ReplyDelete
  3. हे ईश्वर .... मार्मिक रचना

    ReplyDelete
  4. कैसा दारुण दृष्य - स्तब्ध कर देता है !

    ReplyDelete

आत्ममंथन !

बस, आज  कुछ नहीं कहने का क्योंकि आज अवसर है शूरवीरो की पावन सरजमीं के  बंदीगृह के बंदियों से,  कुछ सीख लेने का ।