दिनभर लडते रहे,
बेअक्ल, मैं और मेरी तन्हाई,
बीच बचाव को,
नामुराद अक्ल भी तब आई
जब स़ांंझ ढले,
घरवाली की झाड खाई।
बेअक्ल, मैं और मेरी तन्हाई,
बीच बचाव को,
नामुराद अक्ल भी तब आई
जब स़ांंझ ढले,
घरवाली की झाड खाई।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
अपने मुहल्ले में जरा सा सोबर दीखिए ओर संस्कृत बोलना सीखिए, खुद ही पूरी संस्कृत मत खाइए, थोड़ा बीवी को भी सिखाइए। जब झगड़े का मूड़ हो तो सं...