Friday, April 12, 2013

ऐसे हमारे हाल कब थे !

अधिक व्यस्तता की वजह से क्षमा सहित ये टुच्ची सी गजल प्रस्तुत है :) :-


श्रीमती  तुम्हारे सोचने को, ऐसे हमारे हाल कब थे,
बच्चों तुम्हारे नोचने को, सर पे हमारे बाल कब थे।

भाजी ही में चबाते रोटियां,ऐसी परेशां बात क्या थी,  
अरहर सवा सौ हुई तो हुई, मांगते हम दाल कब थे। 
   
अजब है बड़ी कशमकश, खुद ही उलझकर रह गई,
तुझे फंसाने को ऐ जिन्दगी, हमने बुने जाल कब थे।

मुश्किल किसी की आजमाइश, यकीं के लिहाज से,  
यूं भी इम्तहां लायक हमारे, चलन एवं चाल कब थे।  

मत कर भरोसा जिन्दगी का, बेवफा, खुदगर्ज है ये,
ऐ दिल,उम्र की दहलीज पर, ऐसे बुरे ख़्याल कब थे।

त्यागकर जो गाँव अपना,मुहब्बत न करते शहर से,
जीवन में निवृति के यूं गिनते,साल दर साल कब थे।   

देखते क्यों भला हम,अपनी सोच के उसपार जाकर, 
बिछ जायेगी शतरंज ऐसी, जी के ये जंजाल कब थे।

इंसानियत हुई मजबूर 'परचेत',हैवानियत के सामने,  
मन-चेतना झकझोरते, अस्तित्व के सवाल कब थे। 

छवि गूगल से  साभार   !  

10 comments:

  1. यह सरकार सिर्फ पब्लिक को उल्लू बनाने में माहिर है बस। जनवरी में ही इन्होने इस तरह वाह -वाही लूटी ; The New Year has brought more cheer to about 80,000 beneficiaries of the Central Government Health Scheme (CGHS) in the city as they are now not required to procure a referral letter from a senior authority to avail facilities at private centres. In an order dated January 1, VP Singh, deputy secretary of the ministry of health and family welfare, states, "It has now been decided that CGHS beneficiaries shall herein after be allowed to undergo investigations at private hospitals/diagnostic laboratories/imaging centres empanelled under CGHS after specific investigations have been advised by a CGHS medical officer or a government specialist without requirement of any other referral letter." सीजीएचएस और निजी चिकित्‍सालयों का संघर्ष पर"
    ये थी आपकी टिप्‍पणी, इसे आप मेरे उक्‍त आलेख पर दोबारा पेस्‍ट कर दें।

    ReplyDelete
  2. इंसानियत हुई मजबूर 'परचेत',हैवानियत के सामने,
    मन-चेतना झकझोरते, अस्तित्व के सवाल कब थे। ...........वाह बहुत ही बढ़िया। आपके प्रत्‍युत्‍तरों हेतु धन्‍यवाद।

    ReplyDelete
  3. मत कर भरोसा जिन्दगी का, बेवफा, खुदगर्ज है ये,
    ऐ दिल,उम्र की दहलीज पर, ऐसे बुरे ख़्याल कब थे।

    ....बहुत खूब! बहुत सुन्दर गज़ल...

    ReplyDelete
  4. देखते क्यों भला हम,अपनी सोच के उसपार जाकर,
    बिछ जायेगी शतरंज ऐसी,जी के ये जंजाल कब थे।
    वाह !!! बहुत बढ़िया उम्दा गजल,आभार गोदियाल जी,,

    Recent Post : अमन के लिए.

    ReplyDelete
  5. टुच्ची नहीं है गुरु यही तो सच्ची है...

    ReplyDelete
  6. हा हा, हाल हमारा भी वही है, कालजयी रचना है।

    ReplyDelete
  7. वाह अगर यह टुच्चा माल है तो कालजयी रचनाएं लिखने वालों को मुंह छुपाने की जगह नहीं मिल रही होगी आज :)

    ReplyDelete
  8. अच्छा माल है न कि टुच्चा.

    ReplyDelete
  9. मत कर भरोसा जिन्दगी का, बेवफा, खुदगर्ज है ये,
    ऐ दिल,उम्र की दहलीज पर, ऐसे बुरे ख़्याल कब थे ..

    सच लिखा है ... अंदाज़ जैसा भी रहा ... पर हर शेर सच के करीब है गौदियाल जी ...

    ReplyDelete

दिल्ली/एनसीआर, क्या चिकित्सा मर्ज का मूल मेदांता सरीखे अस्पताल नहीं ?

  चूँकि दिल्ली के मैक्स और हरियाणा  के  फोर्टिस अस्पताल का मुद्दा गरम है, इसलिए इस प्रसंग को उठाना जायज समझता हूँ। पिछले कुछ दशकों से अधिक...