Tuesday, December 2, 2014

हुनर ने जहां साथ छोड़ा, सलीका वहाँ काम आया।






इक ऐसा मुकाम आया,तोहमत छली का आम आया, 
वंश-नस्ल का नाम उछला, गाँव,गली का नाम आया।
   
हमी से सुरूरे-इश्क में , कही हो गई कोई भूल शायद,  
मुहब्बत तो खरी थी हमारी,नकली का इल्जाम आया।  

नजर से आके जब लगे वो, आशिकी का तीर बनकर,  
खुशी की सौगात लेकर, पर्व दीपावली का धाम आया।   

सत्कार काँटों  ने किया पर, थे हमारे ख्वाब कोमल,
सीने लगूंगी फूल बनके, इक कली  का पैगाम आया।  

राग-बद्ध करने चला जब, प्रीति के दो लब्ज 'परचेत' ,
हुनर ने जहां साथ छोड़ा, फिर वहाँ सलीका काम आया।

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4 Comments:

Blogger दिगम्बर नासवा said...

सत्कार काँटों ने किया पर, थे हमारे ख्वाब कोमल,
सीने लगूंगी फूल बनके, इक कली का पैगाम आया ..
बहुत खूब ... कलियों के इस पैगाम को पकड़ के रखना .... कोमल ख्वाब खिलने लगेंगे ......

Tuesday, 02 December, 2014  
Blogger Anamikaghatak said...

kya bat....wah

Tuesday, 02 December, 2014  
Blogger सु-मन (Suman Kapoor) said...

बढ़िया

Wednesday, 03 December, 2014  
Blogger Unknown said...

bahut hi sunder

Wednesday, 03 December, 2014  

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