Tuesday, November 12, 2019

पहेलियां जीवन की।



उत्कर्ष और अप्कर्ष,
कहीं विसाद,कहीं हर्ष,
अस्त होता आफताब,
उदय होता माहताब,
बहुत ही लाजवाब।

कैंसी मौनावलंबी 
ये इंसानी हयात ,
जिस्मानी मुकाम,
उद्गम जिसका आब,
और चरम इसका 
शबाब और शराब।

अंततोगत्वा जिन्दगी
बस, इक अधूरा ख्वाब।
अस्त होता आफताब,
उदय होता माहताब,
बहुत ही लाजवाब।।


3 Comments:

Blogger Nitish Tiwary said...

बहुत सुंदर रचना।
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।
iwillrocknow.com

Thursday, 14 November, 2019  
Blogger Rohitas Ghorela said...

बहुत ही लाज़वाब
बहुत ही लाज़वाब।

वाह... वाह।
ऐसी रचना बहुत दिनों बाद पढ़ी है।
कुछ पंक्तियां आपकी नज़र 👉👉 ख़ाका 

Thursday, 14 November, 2019  
Blogger कविता रावत said...

हर दिन एक नई सुबह होती जरूर है लेकिन सबके लिए एक सा नहीं
बहुत सुन्दर

Tuesday, 19 November, 2019  

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