वो आवाज भी बदलेंगे और अंदाज भी !
चोरी का माल खाके, हुए बदमिजाज भी,
वो जो बेईमान भी है और दगाबाज भी।
मिला माल लुच्चे-लफंगों को मुफ्त का,
घर-लॉकर भी भर दिए, मेज दराज भी।
इख्तियार की मद में,वो ग्रीवा की ऐंठन,
रोग-ग्रस्त चले आ रहे, है वो आज भी।
तनिक जो तरफदार उनके सुधर जाएँ,
वो आवाज भी बदलेंगे और अंदाज भी।
उतरेगा सुरूर उनके माथे से 'परचेत'
तबियत शिथिल होगी, नासाज भी।
इख्तियार=सत्ता
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7 Comments:
बहुत करारा व्यंग्य इस माध्यम से।
BAHUT SUNDAR ABHIBYAKTI LEKIN JAB WE SAMJHE.
तीखा व्यंग्य
नशा उतरे तब न!
बेशर्म को शर्म आयें तब ना
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आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (6-4-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!
सन्नाट व्यंग..
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