Thursday, September 24, 2015

फ़रियाद



रहन ग़मों से अतिभारित, 
काँटों से भरी आवागम दी, 
मन तुषार,आँखों में नमी ज्यादा,
सांसो में हवा कम दी,
    तक़ाज़ों का टिफिन लेकर,
सिर्फ़ इतनी सी ग़िला तुझसे ,    
कि ऐ ज़िन्दगी, तूने हमें, 
दर्द ज्यादा और दवा कम दी।

कहीं गले ही न पड़ जाए, इस डर से कभी किसी ने भेंटा ही नहीं,
अपने बाजूओं को फैलाकर तहेदिल से  किसी ने लपेटा ही नहीं, 
यहां सिर्फ कांच के टुकड़ों सी बिखरकर रह गई है तू ऐ जिंदगी ,
बदकिस्मत, हाथ कटने के डर से तुझे किसी ने समेटा ही नहीं।         

5 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (25-09-2015) को "अगर ईश्वर /अल्लाह /ईसा क़त्ल से खुश होता है तो...." (चर्चा अंक-2109) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुन्दर ai जिन्दगी तूने हमें दर्द ज्यादा दवा कम दी

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  3. जिंदगी से गिला तो हर किसी को रहता है ...
    लाजवाब लिखा है जी ..

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