पहेलियां जीवन की।
उत्कर्ष और अप्कर्ष, कहीं विसाद,कहीं हर्ष, अस्त होता आफताब, उदय होता माहताब, बहुत ही लाजवाब। कैंसी मौनावलंबी ये इंसानी हयात , जिस्मानी मुकाम, उद्गम जिसका आब, और चरम इसका शबाब और शराब। अंततोगत्वा जिन्दगी बस, इक अधूरा ख्वाब। अस्त होता आफताब, उदय होता माहताब, बहुत ही लाजवाब।।