शहर में किराए का घर खोजता दर-ब-दर इंसान हैं और उधर, बीच 'अंचल' की खुबसूरतियों में कतार से, हवेलियां वीरान हैं। 'बेचारे' कहूं या फिर 'हालात के मारे', पास इनके न अर्श रहा न फर्श है, नवीनता का आकर्षण ही रह गया जीने का उत्कर्ष है, इधर तन नादान हैं और उधर, दिलों के अरमान हैं। बीच 'अंचल' की खुबसूरतियों में कतार से, हवेलियां वीरान हैं।।