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बिखरे अल्फाज़ !

   हमने तो ऐ खुदा,खुद अहाते आफतों के लांघे थे,  क्यों हमारे आल्हाद सारे, तुमने सूली पे टाँगे थे।   ज़न्नत पाने की ख्वाइश, हमने पाली ही कब थी, इस दोज़ख में ही सिर्फ दो पल शुकून के मांगे थे। xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx  डेमोक्रेसी रह गई, अब सिर्फ यहाँ पर नाम की,   बात करता नहीं कहीं कोई, इंसान के काम की। नेता चल रहे है लेकर तुष्ठिकरण की वैसाखियाँ,   कोई हिंदुत्व की पकडे हुए है, कोई इस्लाम की।  और अगर देश हित की सोचते हो तो यही कहूंगा कि   गूंगी, हया-विहीन  न कोई मन-मोहनी हो,   महंगाई डायन सी  लगती   न कोई सोहनी हो, कुटिल-सारथियों की अब  कोई  दरकार न हो, लुंठक- बटमारों की यहाँ कोई सरकार न हो !  xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx  जन जड़-चेतन में फिर से  नव-चेतना अलख जगानी होगी, संघवद्ध होकर शठ-भंजन को,  सबको आवाज उठा...

आज का क्रिकेट गीत !

इन पापी लोगो (IPL) ने, इन पापी लोगो (IPL) ने, इन पापी लोगो ने लगा दिया जी सट्टा मेरा......, हो जी हो  सट्टा  मेरा, हां जी हाँ सट्टा  मेरा.........। हमरी न मानो श्री420 से पूछो, हां  हाह्ह्ह्ह्ह  हाँ हमरी न मानो, हमरी न मानो भैया श्री420 से पूछो, जिसने शबाब और शराब में बिठाया भट्टा मेरा......, हो जी हो भट्टा मेरा, हां जी हाँ भट्टा  मेरा.........।  हमरी न मानो विंदू फिक्सर से पूछो, हां हाह्ह्ह्ह हाँ.......... हमरी न मानो, हमरी न मानो विंदू फिक्सर से पूछो, बोंलीवुड पर भी लगाया जिसने बट्टा मेरा......, हो जी हो बट्टा मेरा, हां जी हाँ बट्टा  मेरा.........। इन पापी लोगो (IPL) ने, इन पापी लोगो (IPL) ने, इन पापी लोगो ने लगा दिया जी सट्टा मेरा......, हो जी हो  सट्टा  मेरा, हां जी हाँ सट्टा  मेरा.........।  हमरी न मानो दिल्ली सिपहिया से पूछो, हां हाह्ह...

My heart cries !

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M y heart cries when i n front of my eyes,  a fresh graft scandal erupts, I try to closely monitor the folk and the corrupts. All I can see is bridging cultures, jaws, paws and claws of cruel greedy vultures, hoofed beast everywhere in the form of voters, here and there lie, cajole, cringe  floaters. Seeing locomotion of  the wildebeests and false pledges of   vulturous animals, I have reached to  this regrettable conclusion that I live among bunch of  crooks and criminals.

कार्टून कुछ बोलता है- अनोखा परिचय !

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विचलित मन !

हर घर से होकर गुजरती नियति की गली है,    न हीं मुकद्दर के आगे,यहां किसी की चली है,   नीरस लम्हों का सफ़र,किंतु सकूं के दो पल,  जो हंसकर गुजार दे , वही जिन्दगी भली है।  पिछले तकरीबन एक माह से जिन्दगी की रेल, बस यूं समझिये कि पटरी से उतरी हुई है। पहले कम उम्र में एक परिजन की असामयिक मृत्यु से अस्त-व्यस्त था , और अब अपना प्रिय श्वान जोकि पिछले १3 वर्षों से घर में, घर के एक सदस्य की भांति था, पिछले ४-५ दिनों से अन्न-जल त्यागकर इस बेदर्द जहां से प्रस्थान की तैयारी में है। खैर, यही दुनिया का दस्तूर है, सोचकर  विचलित मन ने बहलने की कोशिश में कुछ टूटा-फूटा काव्य समेटा है, प्रस्तुत कर रहा हूँ  ;         वो क्या डरेंगे भला, कहीं बाहर सफ़र में, जो कफ़न बांधे फिरतें हो, हर वक्त सर में। निरर्थक है उनसे स्नेह का ध्येय रखना, द्वेष, नफरत समाई हो जिनकी नजर में। सेज फूलों की पाने की चाह...

कार्टून कुछ कहता है - प्रजातंत्र की याद में !

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कार्टून कुछ बोलता है- पर उपदेश कुशल बहुतेरे !

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