बिखरे अल्फाज़ !
हमने तो ऐ खुदा,खुद अहाते आफतों के लांघे थे, क्यों हमारे आल्हाद सारे, तुमने सूली पे टाँगे थे। ज़न्नत पाने की ख्वाइश, हमने पाली ही कब थी, इस दोज़ख में ही सिर्फ दो पल शुकून के मांगे थे। xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx डेमोक्रेसी रह गई, अब सिर्फ यहाँ पर नाम की, बात करता नहीं कहीं कोई, इंसान के काम की। नेता चल रहे है लेकर तुष्ठिकरण की वैसाखियाँ, कोई हिंदुत्व की पकडे हुए है, कोई इस्लाम की। और अगर देश हित की सोचते हो तो यही कहूंगा कि गूंगी, हया-विहीन न कोई मन-मोहनी हो, महंगाई डायन सी लगती न कोई सोहनी हो, कुटिल-सारथियों की अब कोई दरकार न हो, लुंठक- बटमारों की यहाँ कोई सरकार न हो ! xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx जन जड़-चेतन में फिर से नव-चेतना अलख जगानी होगी, संघवद्ध होकर शठ-भंजन को, सबको आवाज उठा...