उनपे जो ऐतबार था, अब यह समझ वो मर गया,
यूं समझ कि जो पैग का खुमार था, देह से उतर गया,
परवाह रही न जिंदगी को अब किसी निर्लज्ज की,
संजोए रखा बना के मोती, नयनों से खुद झर गया।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
गैर समझा करते थे जिन्हें हम, दिल ने उन्हें कुछ इसतरह अपनाया, दूर भाग खड़ी हुई तन्हाई हमसे, हम अकेले को जब मिला हमसाया । फिर वो हमसाया कुछ यू...
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