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मिथ्या ही मान लो कि भगवान सब देखता है पर .. !

और यह रही मेरी पहली टिप्पणी अलग से मेरे ही पिछले लेख पर : आज जो हम लोग आम जीवन मे मानवीय मुल्यों का इतना ह्रास देख रहे है, उसकी एक खास वजह यह भी है कि हमारे धर्मो द्वारा निर्धारित जीवन के मुल्यों का कुछ स्वार्थी और तुच्छ लोगो द्वारा अपने क्षणिक स्वार्थो के लिये इनकी अनदेखी करना, इनका उपहास उडाना, खुद को इन मुल्यों से उपर बताना, इत्यादि । इसे मैं इस उदाहरण से समझाता हूं; मान लीजिये आपके आस-पास कहीं चोरी हो गई और आप पति-पत्नी घर पर बच्चो संग उसी विषय पर चर्चा कर रहे है, तो आपके चर्चा के दो नजरिये हो सकते है। एक यह कि चोरी करना बुरी बात है, और चोर को इसका फल जरूर मिलेगा । दूसरा नजरिया यह कि अरे भाई, उसको जरुरत थी तभी तो उसने चोरी की, अगर उसका भी पेट भरा हुआ हो तो भला वह चोरी करने ही क्यो जायेगा?( इस नजरिये को मानने वाले भी तभी तक उसे मान्यता देते है जब तक वह चोर दूसरों के घर मे चोरी कर रहा होता है ,उनके घर मे नही) आप इसमे से पहले नजरिये को धार्मिक अथवा आजकल की भाषा मे साम्प्रदायिक नजरिया कह सकते है और दूसरे नजरिये को सेक्युलर नजरिया, मगर साथ ही यह भी गहन विचार कीजिये कि आपकी इस चर्चा को ...

लो जी, दादा-नाना का गोत्र भी स्वीडन मे पेटेंट हो गया !

आज इस दुनियां मे मौजूद हर धर्म का उद्देश्य उसे मानने वाले अनुयायियों को उनके द्वारा जीवन को जीने के अपने एक खास नजरिये के प्रति प्रेरित और सजग करना होता है। हर धर्म की जहां अपनी कुछ खास विषेशतायें होती है,वही कुछ कमियां भी है। और अक्सर देखा गया है कि यहां, हमेशा ही किसी एक धर्म की दूसरे धर्म के अनुयायियों द्वारा तरह-तरह की आलोचना की जाती रही है। लेकिन शायद इस दुनिया मे हिन्दु धर्म ही एक मात्र ऐसा धर्म है जो कि न सिर्फ़ दुनियां का सबसे पुराना धर्म है अपितु इस धर्म को, इस धर्म के ही मानने वाले तथाकथित सेक्युलरों ने समय-समय पर प्रताडित किया है। जबकि देखा जाये तो अब तक इस धर्म की अनेक मान्यताओं को भले ही परोक्ष तौर पर ही सही, मगर दुनिया के अन्य हिस्सों मे मौजूद दूसरे धर्म के अनुयायियों ने भी मान्यता दी है। यह तो आप सभी जानते है कि पूर्व मे दुनियां भर के वैज्ञानिकों ने बहुत सी ऐसी चीजों की खोज की, अनेक ऐसी बातों को अपने अलग तौर पर प्रमाणिक सिद्ध किया, जिन्हे कि हिन्दु धर्म ग्रंथ और विद्वान आदिकाल मे ही जीवन-शैली मे सम्मिलित कर चुके थे। भले ही आज की पाश्चात्यपरस्त हमारी युवा शिक्षित पीढी बात-...

इक्कीसवीं सदी का हमारा शहरी युवा वर्ग !

आज हमारे देश के शहरी इलाके ज्यों-ज्यों तथाकथित प्रगति की ओर अग्रसर है, त्यों-त्यों इन शहरी इलाकों के वाशिन्दे नित शाररिक तौर पर क्षीणता की गर्त मे डूबे जा रहे है। इसके लिये जिम्मेदार बहुत सारे प्रत्यक्ष और परोक्ष कारण विध्यमान है, जिनमे से कुछ प्रमुख है, भोग और विलासिता की वस्तुए, मनोंरजन के साधन, शहर, कस्बे और मुहल्ले मे खेलने-कूदने के लिये उचित और प्रयाप्त जगहों का न होना, बच्चे का अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक न होना, माता-पिता की लापरवाही और सरकारों की इस ओर उदासीनता । और कम से कम मोदी नगर के एक स्कूल मे कल की यह घटना तो यही सिद्ध करती है कि हमारी युवा पीढी शारिरिक तौर पर कितनी कमजोर है। कल मोदी नगर के टी आर एम पब्लिक स्कूल के १८ वर्षीय बारह्वीं कक्षा के एक छात्र पवनेश पंवार की शारिरिक व्यायाम की परिक्षा के दौरान चक्कर आने से दुखद मृत्यु हो गई। घटना के बाद विधार्थी का परिवार, प्रशासन और खबरिया माध्यम जितना मर्जी हो-हल्ला मचायें, स्कूल प्रशासन को जिम्मेदार ठहरायें, लेकिन हकीकत यही है कि बाहर से लम्बे-चौडे, हष्ठ-पुष्ठ दिखने वाले ये आज के मदर डेयरी और चौकलेट पोषित युवा अन्दर से कितने...

भला मानुष !

भला आदमी न कोई मुझे कह सका, मैं भला मानुष बनकर न रह सका, सच कहने की ऐसी मुई आदत थी कि झूठ के जज्बातों में न बह सका। वह जो यथार्थ से यहां बहुत दूर था, वही सुनने को जमाने को मंजूर था, कृत्रिम वादे ही दिलों को भिगोते है, मुंए सच तो सारे ही कडवे होते है। सत्य,साथ तजने को रजामंद न था, जभी मिथ्या को न संग सह सका, भला आदमी न कोई मुझे कह सका, मैं भला मानुष बनकर न रह सका। सैलाब जब दिल के समंदर का बहा, बस, जुबाँ ने जो सच था वही कहा , फरेबियों के हाथों मैं जब-जब लुटा , तब मानस पटल पे ये तूफान उठा। उजड़ गया सब कुछ ही 'अंधड़' में, मगर कटु मेरा जमीर न ढह सका, भला आदमी न कोई मुझे कह सका, मैं भला मानुष बनकर न रह सका।  

जो कुछ गुल खिलाये थे गए साल ने !

हालत पर मेरी न दिल उनका पसीजा , न ही बेसब्र किया उनको व्यग्रकाल ने, संजोए रखे है  मैंने वो वरक़ -पुंकेसर, जो कुछ गुल खिलाये थे गए साल ने।   शरद में थी ठिठुरी वो यादों की गठरी , ग्रीष्म में जलाया उसे तपस ज्वाल ने, संजोए रखे है  मैंने वो वरक़ -पुंकेसर,  जो कुछ गुल खिलाये थे गए साल ने।   उन्हें झुरमुटों में मन के छुपाये रखा , जो उगले उनके मुँह की लय-ताल ने , संजोए रखे है  मैंने वो वरक़ -पुंकेसर,  जो कुछ गुल खिलाये थे गए साल ने।   मुग्ध हुआ था मैं कभी खुश्बुओ पर, मुझे भी परेशां किया था कली काल ने ,  संजोए रखे है तभी वो वरक़ -पुंकेसर,  जो कुछ गुल खिलाये थे गए साल ने।  

पप्पू कांट डांस साला !

पता नहीं हम हिन्दुस्तानी कब सुधरेंगे , सुधरेंगे भी या नहीं, कोई नहीं जानता ! क्योंकि अगर हममे सुधरने की गुंजाईश होती तो सातवी सदी से दसवी-ग्यारहवी सदी तक , जब सिकंदर, मंगोलों-मुगलों ने हमारे देश पर आक्रमण किया और छद्म तरीके अपनाकर जैचंदो से मदद ली, इस देश में मौजूद तत्कालीन मुख्यमंत्रियों को हारने के लिए, तो अगर हममे गैरत और अक्ल होती तो हमें तभी संभल जाना चाहिए था ! तब नहीं संभले थे तो जब बाबर ने आक्रमण किया तब संभल जाते, तब भी नहीं संभले थे तो जब सोलहवी- सत्रहवी सदी में ईस्ट-इंडिया कंपनी आई थी तभी संभल जाते! तब भी नहीं संभले थे तो १९४७ में जब देश का विभाजन हुआ, तभी संभल जाते! लेकिन नहीं, हमारे पास इतना सोचने के लिए वक्त कहाँ था? देश में जो ज्वलंत मुद्दे है , महंगाई , बेरोजगारी, दरिद्रता और सबसे ऊपर नेतावो और नौकरशाहों का नित बढ़ता भ्रष्टाचार, उसके बारे में हम लोग शायद एक साथ मिलकर इतना उछलते तो क्या पता हमारी बेशर्म सरकारों को कुछ शर्म आ जाती ! आज सड़क चलते आपकी-हमारी जान हर वक्त खतरे में है, माँ-बहनों की आबरू खतरे में है, लेकिन सरकार के पास हमें सुरक्षा देने के लिए प्रयाप्त साधन नहीं ...

सभी मित्रो को गणतंत्र-दिवस की मंगलमय कामना !

हर नागरिक का यह कर्तव्य होता है कि वह अपने देश और उसके संविधान का सम्मान करे ! लेकिन यह कितनी अजीब बात है कि जिस संविधान निर्माता को अपना आदर्श बताकर कुछ लोग, प्रधानमंत्री की कुर्सी तक को प्राप्त करने के ख्वाब देखते है, वही लोग उसी संविधान निर्माता द्वारा बनाए गए संविधान को आज अपने ठेंगे पर रखे है! खैर, सभी मित्रो को गणतंत्र दिवस की मंगलमय कामना !