Wednesday, August 18, 2010

ताक बैठे है गिद्ध क्यों, जनतंत्र की डाल पर!




क्या कभी सोचा है तुमने इस सवाल पर,
क्यों आज ये देश है अपना, अपने ही हाल पर।
ढो रहा क्यों अशक्त शव अपना काँधे लिए,
ताक बैठे  है गिद्ध क्यों, जनतंत्र की डाल पर॥

भ्रष्टाचार भरी आज यह सृष्ठि क्यों है,
कबूतरों के भेष में बाजो की कुदृष्ठि क्यों है।
'शेर-ए-जंगल' लिखा क्यों है गदहे की खाल पर,
ताक बैठे  है गिद्ध क्यों, जनतंत्र की डाल पर॥

महंगाई से निकलता दरिद्र का तेल क्यों है,
राष्ट्र धन से हो रहा फिर लूट का खेल क्यों है।  
शठ प्रसंन्न है आबरू वतन की उछाल कर,
ताक बैठे  है गिद्ध क्यों, जनतंत्र की डाल पर॥

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17 Comments:

Blogger शिवम् मिश्रा said...

आज के हालात बयां कर दिए आपने !
बेहद उम्दा रचना !

Friday, 20 August, 2010  
Blogger संगीता पुरी said...

बहुत अच्‍छी रचना !!

Friday, 20 August, 2010  
Blogger Mithilesh dubey said...

ek sam sach likha hai aapne

Friday, 20 August, 2010  
Blogger vandana gupta said...

आज का हाल बयाँ कर दिया ……………देश के हाल पर जो तड्प है वो उभर कर आयी है।

Friday, 20 August, 2010  
Blogger honesty project democracy said...

क्या कहें इन साले भ्रष्ट नेताओं से तो गिद्ध भी अच्छे हैं जो जिन्दा इंसान को नहीं खाते हैं ,ये साले हरामी सूअर की औलाद तो जिन्दा इंसान को नोच कर खा रहें हैं ...अब तो इन सालों का कुछ सोचना ही होगा एकजुट होकर ...

Friday, 20 August, 2010  
Blogger संजय बेंगाणी said...

उल्लू बनी जनता, बैठी होगी हर साख पर.

लूटेरे बनाएंगे हवा महल, शहीदों की राख पर.

Friday, 20 August, 2010  
Blogger मनोज कुमार said...

सुन्दर रचना

Friday, 20 August, 2010  
Blogger प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी ही धारदार रचना। इन गिद्धों के कारण सबका विश्वास उठ रहा है प्रजातन्त्र पर।

Friday, 20 August, 2010  
Blogger डॉ टी एस दराल said...

प्रभावशाली रचना ।

Friday, 20 August, 2010  
Blogger दीपक 'मशाल' said...

आपकी रचनाओं की धार इतनी पैनी है कि एक दिन ये बुराइयों को काटेगी जरूर..

Friday, 20 August, 2010  
Blogger दीपक 'मशाल' said...

wapas aaya dekh achchha laga bahut.. :)

Friday, 20 August, 2010  
Blogger ताऊ रामपुरिया said...

बेहद सटीक और पैनी रचना, शुभकामनाएं.

रामराम.

Friday, 20 August, 2010  
Blogger VICHAAR SHOONYA said...

"जहां 'शेर-ए-जंगल' लिखा होगा,हर गदहे की खाल पर"

बहुत सटीक और उम्दा रचना.

Friday, 20 August, 2010  
Blogger चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

गोदियाल साहब! ई ता पूरा चिड़ियाखाना हो गया है... उल्टा लटका हुआ चमगादड़ भी होगा कहीं कोना में... एकदम सकह्चा तस्बीर खींचे हैं आप!!

Friday, 20 August, 2010  
Blogger रानीविशाल said...

Behad Prabhavshali rachana...dhanywaad!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/

Saturday, 21 August, 2010  
Blogger संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत अच्छी रचना ...तीखा कटाक्ष ...

Saturday, 21 August, 2010  
Blogger सूबेदार said...

सामयिक कबिता क़े लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.
क्या करेगे इन देश द्रोहियों क़ा

Monday, 23 August, 2010  

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