अब तू ही बता……।
तू ही बता के हमको जहन में उतारा क्यों था,
दिल शीशे का था तो पत्थर पे मारा क्यों था?
सारा दोष भी तुम्हारा और चित-पट भी तेरी,
कसूर गर ये हमारा था, तो नकारा क्यों था?
जब तोड़कर बिखेरनी थी,तमन्नायें इसतरह,
फिर मुकद्दर अपने ही हाथों संवारा क्यों था?
खूब शोर मचाया था, अपनी दरियादिली का,
तन-मन इतना ही तंग था तो वारा क्यों था?
नहीं थी तुम्हारी कोई आरजू, कोई जुस्तजू,
तो संग चलने को तुमने हमें पुकारा क्यों था?
बेकसी-ऐ-इश्क, फेरनी ही थी नजर 'परचेत',
तो वक्त-ऐ-साद*तुमने हमको निहारा क्यों था?.
वक्त-ऐ-साद*=खुशहाली में
छवि गूगल से साभार !
Labels: My lyrics

11 Comments:
Aabhar Yashoda ji
वाह, बहुत ही सटीक और शानदार गजल.
रामराम.
बहुत खूब ....
बढ़िया ग़ज़ल
latest post नेताजी सुनिए !!!
latest post: भ्रष्टाचार और अपराध पोषित भारत!!
बहुत बढ़िया .....
:-(
जय हो, दमदार..
शानदार....बधाई
बहुत सुंदर
बढिया
तोड़कर बिखेरनी ही थी, तमन्नायें इस तरह,
फिर मुकद्दर अपने ही हाथों संवारा क्यों था? ..
सही प्रशन है ... दिल के भाव सहेज दिए आज तो ...
लाजवाब लिखा है ...
टूटे हुए दिल की फरियाद
जो भूल गया उसकी याद
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home