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Showing posts from August, 2014

जोग लिखी

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मंजुल  समर,शीतल बयार, सर्द जाड़े,  वन,हिमनद,गाँव-गलियन, खेत,बाड़े ।   ख़ुद बालपन हुआ संबल जिनसे कभी,  चीड़, देवदार, बुराँस वो सब वृक्ष छाड़े।     प्रकट उसमे भी था अग्रज  प्रेम होता,  जब लिया करते वो हमको  हाथ आड़े।    तरेरकर नयन,रूबरू होते थे जो कभी,   वो वैर-विद्वेष,गिले-शिकवे सब पछाड़े।  उदर वास्ते  सुरम्य हिमशिखर बिसरे,    पड़े निन्यानवे  के फेर में, गि न पहाड़े।  कोहलू के से बैल बनकर रह गए अब ,    हर रात बीते दारूण यहां, दिन दहाड़े।  बन गए ज्यूँ कि श्वान धोबी  का 'परचेत',  हुए कुटुम्ब से महरूम,मुलाज़मत  लताडे।   

नादाँ !

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थाम लो उम्मीद का दामन, छूट न जाए,   रखो अरमाँ सहेजकर, कोई लूट न जाए।    तुम्हारे ख़्वाबों से भी नाजुक है दिल मेरा,   हैंडल विद एक्स्ट्रा केयर,कहीं टूट न जाए। उलटबासी  शायद ही बचा रह गया हो कोई धाम, क्या मथुरा, क्या वृंदावन,क्या काशी, किस-किस से नहीं पूछा पता उसका, क्या धोबी,क्या डाकिया,क्या खलासी,   सबके सब फ़लसफ़े,इक-इककर खफ़े,         लिए घुमते रहे बनाकर सूरत रुआँसी,         उम्र गुजरी,तब जाके ये अहसास हुआ, जिंदगी घर में थी, हमने मौत तलाशी। 

कार्टून कुछ बोलता है : संसद को बंदरों से बचाने का अनोखा तरीका !

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मानव निर्मित बढ़ती त्रासदियां !

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पिछले  दो दिनों  में लगातार दो प्राकृतिक आपदाओं, एक  उत्तराखंड  और दूसरे  पुणे  ने  लगभग १६० जिन्दगियों  को पलभर में लील  लिया।  इसे प्राकृतिक आपदा कहने में  बड़ा आसान लगता है कि  जी बाढ़ आने , बादल फटने अथवा लैंडस्लाइड  की वजह से ऐसा हो गया ।  जबकि  कड़वी सच्चाई यह है  कि  ये मानव निर्मित आपदाए है।   बादल पहले भी फटते  थे, बाढ़ पहले भी आती थी  और लैंडस्लाइड पहले भी होती थी,  लेकिन सिर्फ कुछ ख़ास मौकों और  प्रकृति के अत्यधिक बिकराल होने पर ही  जन-धन की हानि होती थी।   आज की तरह हर कोस पर ज़रा सा  बारिश होने  या बाढ़ आने से ऐसा नुकशान नहीं हुआ करता था।  हम अगर इतिहास में  थोड़ा सा पीछे जाएँ तो  सन  १९७० में बिरही नदी पर  सन १८९३ में  बनी विशाल झील के टूटने ने  जो बिकराल रूप  उत्तराखंड  के चमोली से हरिद्वार तक धरा था,  और  भारी जन-धन की जो हानि उस जमाने  में हुई थी, कल्पना करके रूह काँप जाती है...