Sunday, January 5, 2020

यकीं


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ऐ नींद मेरी !

ऐ प्रिय, नींद मेरी ! बस, यूं ही मगर, पता नहीं क्यों, कुछ अनिश्चित ही लग रही है मुझे, आज भी मुलाकात तेरी। मस्तिष्क का मेरा सुक्ष्...