पीर पराई ।


दर्द उनका, सिर्फ वहीं जान पायेंगे
जिन्हें, तमाम रात नींद नहीं आती,
खामोश निशा, आंखों ही आंखों मे
घिसट-घिसट कर कैंसे गुजर जाती।
ऐ गुलजार, ये तुम्हें है मालूम कि मुझे,
सुबह होने मे कितने जमाने लगते हैं।।

Comments

Popular posts from this blog

यूं भी बावफा होते है लोग !

धार्मिक भावनाएं क्या हुई, कोई छुई-मुई हो गई !

'नारी' की चिंता में दुबले कुछ ब्लॉगर मित्र !