Posts

दास्ताने टेररिस्तान !

नाम पाक, मंसूबे  नापाक, लत संत्रास स्वाद की, सब झूठे,मक्कार, स्तुति करूँ क्या किसी एक-आद की !         पिद्दीभर एबटाबाद तो अपना इनसे सम्भाला न गया, और कंगले, बात करते फिरते थे हमारे अहमदाबाद की !!   बीज जैसा, पौध वैसी, उसपर खुराक द्वेष-खाद की,   छीनकर दुनिया का अमन-चैन, सुख-शांति बर्बाद की ! कांटे खुद बोये,दोष हमें दिया, अरे कायरों ! हम तुमसा दाऊद-ओसामा नहीं पालते, ये भूमि है गांधी, बोष, राजगुरु, भगतसिंह, आजाद की !!

प्रवाहहीन रुग्ण-मानसिकता के शिकार लोग !

Image
बहुत दिनों बाद किसी तरह आज लिखने का मूड बना पाया हूँ, पेश है एक प्रस्तुति ;  आखिरकार प्रिंस विलियम और केट मिड्लटन की शाही शादी का भोज डकारने के बाद दुनियाभर के मीडिया और गतिहीन रुग्ण मानसिकता के शिकार विश्वभर के तमाम लोगो द्वारा पैदा किया गया एक अजीवो-गरीब वातावरण अब जाकर कुछ ठंडा पड़ा है ! किन्तु एक डर अभी भी बना हुआ है कि हो सकता है कि शाही दम्पति सुहागरात मनाने हेतु अपने पुराने औपनिवेश के राजमहलों को ही प्राथमिकता दे, अगर ऐसा हुआ तो इस पश्चिमी विक्षोभ के कारण बने हवा के कम दबाव के अभी और कुछ दिन तक चलने की आशंका है !  इंसानियत के नाते कम ( क्योंकि इंसानियत के नाते तो हम कितनो को ऐसे मौकों पर अपनी शुभकामनाये देते है?) और इनके एक भूतपूर्व गुलाम का खून होने के नाते, मैं भी अपना यह कर्तव्य समझता हूँ कि इस शाही नव-दम्पति को इस सुअवसर पर अपनी शुभकामनाये प्रेषित करू ! साथ ही रगो में छुपे महीन गुलाम-कण कहीं न कहीं, मन के किसी कोने में यह आशंका भी तो पैदा करते रहते है कि मैं कहीं इनके लिए कुछ गलत लिख गया, या मैंने अपने गुलाम-धर्म का पा...

दोगलापन !

Image
मलिंगा, विश्व कप फ़ाइनल मैच से पहले और मैच के बाद; वाह भई, शाहिद अफ्रीदी, तेरा भी ईमान डोल गया, यहाँ आकर झूठ बोला, वहाँ जाके तू सच बोल गया ! देख,कितना गिरा देती है इंसान को, नीयत डोलकर, बीसियों झूठ बोलने पड़ते है, फिर एक झूठ बोलकर ! मुह लगाते न तुम जैसों को, गर हम बड़े दिलवाले होते, न असुर मूंग दलता छाती, न राज करते हम पर खोते ! सरे-राह मगर क्यों तू , अपना सड़ा मुह खोल गया, यहाँ आकर झूठ बोला, वहाँ जाके सच बोल गया ! चित्र  एक  मेल  से  मिला !  

अप्रैल फूल !

गिरह बांधी है मिसरे की, मतले से मक्ते तक दर्द ने, तुम कहो न कहो,खुद बात कह दी चेहरे की जर्द ने। पतझड़ में होता पत्ता-पत्ता, डाली से खफा क्यों है, कोंपल पैदा कर दिए है, दरख्तों पर जमी गर्द ने। बुलंदियां पाने की चाहत में, तहजीब त्याग दी , गिराया कहाँ तक, हसरत-ए-दीदार की नबर्द ने। हासिल न कुछ अब जिस्म पर से पर्दा हटाने से,  णवत्ता तो बता दी है  प्रतिरूप नग्न-ए-अर्द्ध ने। हर दिन तबसे 'फूल' ही नजर आता है 'परचेत', पर्दा, बुर्का पहनना, शुरू कर दिया जबसे मर्द ने।   ..

जहां भगवान् ही अपना शतक न बना पा रहा हो...!

जहां तक मैं समझता हूँ, भारत और पाकिस्तान का शायद ही कोई ऐसा क्रिकेटप्रेमी होगा जो यह न जानता हो कि खेल खेल होता है, और दो टीमे जब आपस मे खेलेंगी तो अवश्य ही एक जीतेगी और एक हारेगी ! अधिक से अधिक यही हो सकता है कि मैच दोनों टीमों के बीच बराबरी पर छूटे (टाई रहे) ! और शायद बहुत से लोग मेरी इस बात से भी इत्तेफाक रखते हो कि किसी भी खेल में इससे अधिक की उम्मीद रखना शायद मूर्खता ही कहलायेगी ! लेकिन यह भी एक बिडम्बना ही है कि हम लोग कहाँ इतने में ही संतुष्ट होने वाले ठहरे , अत: हमने ढूढ़ निकाली एक नई दवा " क्रिकेट डिप्लोमेसी" ! दोनों ही पक्षों, भारत और पाकिस्तान में से कोई भी यह मानने को राजी नहीं कि यह दोनों देशों की टीमों के बीच सिर्फ एक एक दिवसीय खेल है और उनकी टीम इस खेल में सिर्फ और सिर्फ अच्छा खेले, बल्कि वे चाहते है कि बस उनकी ही टीम जीत हासिल करे ताकि वे दूसरे पक्ष को नीचा दिखा सकें ! जहाँ तक पाकिस्तान की टीम का सवाल है, मैं समझता हूँ कि अगर हम इस खेल को केवल खेल के ही दायरे में देखने की कोशिश करें, और हाल के वर्षों में उनके खिलाड़ियों के कारनामों की वजह से उनकी परफोर्मेंस का आ...

कार्टून कुछ बोलता है-खिलाडियों का उत्साहवर्धन !

Image

कुरुर पुनरावृति !

Image
शर्मो -हया गायब हुई, आंख,नाक,गालों से, गौरवान्वित हो रहा, अब देश घोटालो से । विदुर ने संभाला है, अभिनय शकुनि का, हस्तिनापुर परेशां है, गांधारी की चालों से ॥ द्यूत क्रीड़ा चल रही, घर,दरवार,जेल मे, पांसे खुद जुट गए, शह-मात के खेल मे । इन्द्र-प्रस्थ पटा पडा, कुटिल दलालों से, हस्तिनापुर परेशां है, गांधारी की चालों से ॥ एकलव्य का अंगूठा, बहुमूल्य हो गया, सुदूर दक्षिण का इक  रंक-ए- राजा तुल्य हो गया । यक्ष भी हैरान है, करुणाजनित जालों से, हस्तिनापुर परेशां है, गांधारी की चालों से ॥ गरीब-प्रजा से भी, लगान जुटाने के बाद, सफ़ाई के नाम पे, अरबों लुटाने के बाद । गंगा-जमुना मजबूर है, बहने को नालों से, हस्तिनापुर परेशां है, गांधारी की चालों से ॥ युवराज दुर्योधन है, ताक मे सिंहासन के, चीरहरण को आतुर है, हाथ दू:शासन के । बेइज्जत हो रही द्रोपदी, खाप-चौपालों से, हस्तिनापुर परेशां है, गांधारी की चालों से ॥ कहीं ढूढना न फ़िर, अर्जुन-कान्ह...