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जोग लिखी

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मंजुल  समर,शीतल बयार, सर्द जाड़े,  वन,हिमनद,गाँव-गलियन, खेत,बाड़े ।   ख़ुद बालपन हुआ संबल जिनसे कभी,  चीड़, देवदार, बुराँस वो सब वृक्ष छाड़े।     प्रकट उसमे भी था अग्रज  प्रेम होता,  जब लिया करते वो हमको  हाथ आड़े।    तरेरकर नयन,रूबरू होते थे जो कभी,   वो वैर-विद्वेष,गिले-शिकवे सब पछाड़े।  उदर वास्ते  सुरम्य हिमशिखर बिसरे,    पड़े निन्यानवे  के फेर में, गि न पहाड़े।  कोहलू के से बैल बनकर रह गए अब ,    हर रात बीते दारूण यहां, दिन दहाड़े।  बन गए ज्यूँ कि श्वान धोबी  का 'परचेत',  हुए कुटुम्ब से महरूम,मुलाज़मत  लताडे।   

नादाँ !

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थाम लो उम्मीद का दामन, छूट न जाए,   रखो अरमाँ सहेजकर, कोई लूट न जाए।    तुम्हारे ख़्वाबों से भी नाजुक है दिल मेरा,   हैंडल विद एक्स्ट्रा केयर,कहीं टूट न जाए। उलटबासी  शायद ही बचा रह गया हो कोई धाम, क्या मथुरा, क्या वृंदावन,क्या काशी, किस-किस से नहीं पूछा पता उसका, क्या धोबी,क्या डाकिया,क्या खलासी,   सबके सब फ़लसफ़े,इक-इककर खफ़े,         लिए घुमते रहे बनाकर सूरत रुआँसी,         उम्र गुजरी,तब जाके ये अहसास हुआ, जिंदगी घर में थी, हमने मौत तलाशी। 

कार्टून कुछ बोलता है : संसद को बंदरों से बचाने का अनोखा तरीका !

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मानव निर्मित बढ़ती त्रासदियां !

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पिछले  दो दिनों  में लगातार दो प्राकृतिक आपदाओं, एक  उत्तराखंड  और दूसरे  पुणे  ने  लगभग १६० जिन्दगियों  को पलभर में लील  लिया।  इसे प्राकृतिक आपदा कहने में  बड़ा आसान लगता है कि  जी बाढ़ आने , बादल फटने अथवा लैंडस्लाइड  की वजह से ऐसा हो गया ।  जबकि  कड़वी सच्चाई यह है  कि  ये मानव निर्मित आपदाए है।   बादल पहले भी फटते  थे, बाढ़ पहले भी आती थी  और लैंडस्लाइड पहले भी होती थी,  लेकिन सिर्फ कुछ ख़ास मौकों और  प्रकृति के अत्यधिक बिकराल होने पर ही  जन-धन की हानि होती थी।   आज की तरह हर कोस पर ज़रा सा  बारिश होने  या बाढ़ आने से ऐसा नुकशान नहीं हुआ करता था।  हम अगर इतिहास में  थोड़ा सा पीछे जाएँ तो  सन  १९७० में बिरही नदी पर  सन १८९३ में  बनी विशाल झील के टूटने ने  जो बिकराल रूप  उत्तराखंड  के चमोली से हरिद्वार तक धरा था,  और  भारी जन-धन की जो हानि उस जमाने  में हुई थी, कल्पना करके रूह काँप जाती है...

भारतीय परम्पराएँ और मार्क्स, मैकॉले तथा इब्न रुश्द के छद्म भक्त !

देख रहा हूँ कि मार्क्स, मैकॉले  और  इब्न रुश्द के मुखौटों में छिपे कुछ पश्चमी  दलाल  श्री दीना नाथ बत्रा जी की  किताब पर काफी हायतौबा  मचाये हुए हैं।  वेंडी डोनिजर की तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह से गलत किताब का बचाव करने के लिए तो ये स्वार्थांध  दौड़ पड़े थे, वह सिर्फ इसलिए क्योंकि मामला  एक  पश्चमी लेखिका से सम्बद्ध था। और जो उन अनेक भारतीयों की यह मानसिकता भी  दर्शाता है कि स्वदेशी को   फेंक देना चाहिए और अगर  कोई चीज पश्चिम से आ रही है तो उसे तुरंत आत्मसात  कर लेना चाहिए। वाह ! जिस प्रखरता  से आज ये कुछ मौकापरस्त  दीनानाथ जी की किताब के खिलाफ बोल रहे है,  मैं समझता हूँ कि  इन  मानसिक तौर पर दिवालिये लोगों को अगर ज़रा भी  अपनी सांस्कृतिक विरासत के  प्रति  लगाव और सम्मान होता तो यही  प्रखर विरोधी स्वर तब सुनाई देने चाहिए थे, यह प्रचंड विरोध उनका तब सामने आनी चाहिए था जब   वेंडी डोनिजर ने अपनी उस बकवास किताब में लक्ष्मण...

दिनचर्या

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जिंदगी के लम्हें,  छलकते हुए बेबस बीते हैं,  फिर भी अनुस्मरण भाण्डे,  जस के तस रीते हैं।     हमको भी नहीं मालूम,  गुजरा है वक्त किस तरह, मलाल दस्तूर बन गया ,  गश खाते है और कश पीते हैं।।    

चुनावी महाकुम्भ का आरती विसर्जन और …।

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और आखिरकार खत्म हो ही गया, चुनाव का एक और महाकुम्भ। हमेशा की भांति इस बार भी  लोकतंत्र के इस वैतरणी संगम पर बहुत से संतों और पापियों ने मोक्ष प्राप्ति की आस और अपने तमाम पापों को धोने की मंशा से  डुबकी लगाईं। यह  बात और है कि वैभव की चकाचौंध मे अंधे हुए अनेकानेक श्रद्धालूओं  ने  प्रयास तो अपने तमाम पापों को धोने का किया था, मगर इस शुद्धिकरण क़ी हड़बड़ाहट मे मेला-मार्ग  से गुजरते वक्त वो कितने और पाप अपने खाते मे हस्तांतरित कर गये, खुद भी नहीं जानते। आस्था ही जब अपने मूल से भटक जाये तो पथिक का राह भटकना तो स्वाभाविक ही है।   आजादी के बाद से ही  हालांकि समय-समय पर इस देवास्थल  के पुजारियों की करतुतों और कारगुजारियों से लोकतंत्र का यह पवित्र धाम कलुषित होता रहा है, किन्तु जितना पिछले एक दशक मे  देखने को मिला, मै समझता हूँ कि शायद ही इतना कभी पहले हुआ हो। गत दस वर्षों का यह कालखण्ड स्वतन्त्र भारत के इतिहास मे एक ऐसा दुरास्वप्...