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छणिकाएँ
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एहसास : 'अच्छे दिन" अभी दूर की कौड़ी है, इस जोड़े का दुस्साहस देखकर इतना तो एहसास मिल ही गया। रमादान: इबादत के इस दौर में, मांगता हूँ मैं भी ये दुआ खुदा से कि ऐ खुदा, कुछ अंधभक्तों को भी अपने, थोड़ी सी अक़्ल देना। क्रेडिट कार्ड: बनकर आया है जबसे अपनी श्रीमती जी का क्रेडिट कार्ड, घर ई-कॉमर्स कंपनियों के दफ़्ती,डिब्बों के ढ़ेर में तब्दील हो गया है। अच्छे दिनों के इंतज़ार में : जरुरत से ज्यादा 'लीद' निकाली है जबसे कम्बख्त मैगी ने, बुरे दिन लौट आये है स्वास्थ्य विघातक अर्वाचीन बीवियाँ के। योग जूनून: कुछ इसतरह फंस गई जिंदगी अलोम -विलोम के चक्कर में कि अब तो बीवी के हाथों की सुबह की चाय भी नसीब नहीं होती।
नृशंसता का यथार्थ !
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नापाक हरकते कभी पाक नहीं होती , चालबाजी कभी इत्तेफाक नहीं होती , वास्ता दे-दे के जो अनुसरण करवाये , ऐसे मजहबों की कोई धाक नहीं होती। बलात् भगत जितना भी बद्ध दिखाए, जहन किंतु श्याम वर्ण त्याग न पाए , क्रिया, मुख से जितना भी दम्भ भरे, त्रासित छाती कभी चाक नहीं होती। नियम,नियमावली ऐसे कामगार के, तामील होती है ज्यूँ ,बेड़ियां डार के , एक आजाद शख़्सियत वहाँ होती है, जहां बंदिशों की कोई ताक नहीं होती। अपने लिए तो बटोरा उस पार तक, और दूसरों का छीना जीने का हक़ , नृशंसता की हर हद लांघी है फिर भी, शर्म से नीची कोई नाक नहीं होती। साये में जिंदगी कोई करामात ही है , मुकाम मिले तो वो भी खैरात ही है , अस्तित्व का सच तो ये है 'परचेत ', अवसानोपरांत कोई ख़ाक नहीं होती।
हुनर ने जहां साथ छोड़ा, सलीका वहाँ काम आया।
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इक ऐसा मुकाम आया,तोहमत छली का आम आया, वंश-नस्ल का नाम उछला, गाँव ,गली का नाम आया। हमी से सुरूरे-इश्क में , कही हो गई कोई भूल शायद, मुहब्बत तो खरी थी हमारी,नकली का इल्जाम आया। नजर से आके जब लगे वो, आशिकी का तीर बनकर, खुशी की सौगात लेकर, पर्व दीपावली का धाम आया। सत्कार काँटों ने किया पर, थे हमारे ख्वाब कोमल, सीने लगूंगी फूल बनके , इक कली का पैगाम आया। राग-बद्ध करने चला जब, प्रीति के दो लब्ज 'परचेत' , हुनर ने जहां साथ छोड़ा, फिर वहाँ सलीका काम आया।