Monday, August 19, 2013

हो गए हैं हम क्यों खुदगर्ज इतने !

   

पैदा हुए हैं कहाँ से, ये मर्ज इतने,
हो गए हैं हम क्यों खुदगर्ज इतने।

गुज़रगाह बन गए हैं, सेज-श्रद्धेय,

अगम्य हो गए जबसे फर्ज इतने।

       वफ़ा का चलन, सिकुड़ता जा रहा,        

दम तोड़ते जा रहे क्यों अर्ज इतने।

सिर्फ स्व:हित पर सिमट गई सोचें,
बुलंदियों पे 'पहले मैं' के तर्ज इतने।


लहलुहान है सहरा, रिश्तों के खूं से,

वारदात-ऐ-बेवफाई होते दर्ज इतने।


तामील का आता,जब दौर अपना, 

तभी आते हैं आड़े क्यों हर्ज इतने। 

 रेहन रखी क्यों है, गरिमा 'परचेत',   
हमपे किस-किसके हुए कर्ज इतने।  


गुज़रगाह=street बन गए हैं सेज-श्रद्धेय= elders'bed


अगम्य=congested हो गए जबसे फर्ज इतने।

13 comments:

  1. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

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  2. नमस्कार आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार (20 -08-2013) के चर्चा मंच -1343 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  3. सच्‍ची बात।

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  4. पर समझ नहीं आया तीन तीन मकान बेच देना ...

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    1. काजल जी, कई बार एकाकी विचलित मन वह सब करवा देता है जो इंसान सामान्य परिस्थितियों में करना मुनासिब नहीं समझता !

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  5. बेहद उम्दा एंव सटीक रचना पी.सी.गोदियाल "परचेत" जी।

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  6. हां, ये सच है
    बहुत सुंदर प्रस्तुति

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  7. बहुत खूब कही है गजल


    छोटी बहर की बड़ी गजल है।


    रेहन रखी क्यों है, गरिमा 'परचेत',
    हमपे किस-किसके, हुए कर्ज इतने।

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  8. सभी सार्थक, बहुत उम्दा लगी रचना की पंक्तियाँ
    बहुत बहुत आभार … सादर !

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  9. बहुत सटीक और सार्थक, हार्दिक शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  10. बात को उम्दा, खरा खरा रख दिया ...
    सभी शेर हकीकत लिए हैं ...

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  11. किधर बह गयी सीख हमारी...
    दुखद..

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