यूं भी बावफा होते है लोग !
ये दिल निसार करके जाना कि राहे जफा होते है लोग, सच में, हमें मालूम न था कि यूं भी बावफा होते है लोग ! सोचते थे कि नेमत है खुदा की ये जज्बा , इल्म न था कि वफ़ा की कस्मे खाने वाले, इस कदर बेवफा होते है लोग ! दिल और आँख का ऐसा आपसी देखा जो समन्वय 'परचेत', नजर देखे, दिल शकूं पाए, मनीषी ऐसे ही नफ़ा होते है लोग !

गजब भावाभिव्यक्ति ||
ReplyDeleteराहुल भईया लग रहे हैं ...
ReplyDeleteपर इतने लाजवाब शब्द उनके लिए तो आप नहीं लिख सकते ... :)
सटीक ..
ReplyDeleteभाई जी ! बड़ी दूर की कौड़ी फैंकी आपने !
ReplyDeleteपर सटीक :-)))
शुभकामनाएँ!
इसपे अपना एक शे'र याद आ रहा है ...पर फिर कभी ..
चलो आज ही सही .इसपे फिट बैठ रहा है ..?
मुझे बताना जरूर ..
अर्ज है : अब भी देते हो मुझे जीने की दुआएं
क्या मेरे गुनाहों की फेहरिस्त इतनी लंबी है ||
---अकेला
लाज़वाब प्रस्तुति...
ReplyDelete:):)
ReplyDeleteगजब..
ReplyDeleteबहुत खूब ।
ReplyDeleteबेहतरीन अभिव्यक्ति ... ...
ReplyDeleteवाह...
ReplyDeleteआज आपके ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद आना हुआ. अल्प कालीन व्यस्तता के चलते मैं चाह कर भी आपकी रचनाएँ नहीं पढ़ पाया. व्यस्तता अभी बनी हुई है लेकिन मात्रा कम हो गयी है...:-)
ReplyDeleteआप तो कमाल के चित्रकार हैं...रचनाकार तो हैं ही...बेहतरीन. बधाई
नीरज
बहुत खूब
ReplyDeleteबहुत उम्दा!
ReplyDeleteबहुत खूब .....
ReplyDeleteबहुत अच्छी..!!
ReplyDeleteलाज़वाब।
ReplyDeleteज़रूर माफी मिल जाएगी ...सुंदर अभिव्यक्ति
ReplyDeleteबारीक़ रेखाओं से उद्धत ख्याल
ReplyDeleteशब्द एवं चित्र..दोनों का बेहतरीन ताल मेल..............
ReplyDeleteआभार उपरोक्त पोस्ट हेतु.
लाज़वाब...
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