Posts

अब चित्रकार द्बारा भयादोहन ( ब्लैक मेलिंग ) !

पता नहीं, इस देश में इन तथाकथित अल्पसंख्यको की भयादोहन की मानसिकता कब सुधरेगी ! पता चला है कि एक खबरिया टीवी चैनल को दिए अपने साक्षात्कार में, कानून से बचकर भागते हुए पिछले चार सालों से विदेश में रह रहे वरिष्ट चित्रकार ९४ वर्षीय श्री मकबूल फिदा हुसैन ने इस शर्त पर तत्काल देश लौटने की इच्छा जाहिर की है कि यदि सरकार उन्हें संरक्षण और सुरक्षा मुहैया कराये तो वो तुंरत ही स्वदेश आने को बेताव है, और आकर तुंरत चिदम्बरम साहब का आदाब भी करेंगे ! जहाँ तक कला की बात है, मैं चित्रकारी के विषय में बहुत ज्यादा ज्ञान तो नहीं रखता, मगर जितना कुछ रखता हूँ उसके आधार पर कह सकता हूँ कि निसंदेह हुसैन साहब एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चित्रकार है, चाहे वो जिस आधार पर भी बने हो! चूँकि आज स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी की पुण्य तिथि है, इसलिए मुझे याद आ रहा है कि एक जमाना था, जब ये हुसैन साहब स्वर्गीय गांधी को खुश करने हेतु और खुद को प्रकाश में लाने हेतु उनकी भिन्न-भिन्न दुर्गा रूपी तस्वीरे बनाया करते थे, और जब थोडा सा प्रसिद्धि पा ली, तो इन्होने दुर्गा को किस रूप में पेंट किया, किसी को बताने की जरुरत मैं ...

तेल का खेल !

एक झटके में करीब पांच सौ करोड़ की भैंस गई पानी में, जिनको जीवन की हानि हुई वह अलग ! जब हादसा हो जाता है अधिकारीगण तब पूछते है कि अब क्या करना है ? मंत्री जी झट से जांच कमेटी बिठा देते है, अपने कंधे का भार उतारने के लिए ! और बस, हो गई इनके कर्तव्य की इत्श्री ! जांच करने वाले भी दो-चार करोड़ का बिल बिठा देंगे, सो अलग ! २०२० तक एक विकसित राष्ट्र बनने को छटपटा रहे इस देश के नेता और अफसरगण इतनी भी सम्बेदंशीलता नहीं रखते कि यह सोच पाए कि आपातकाल के लिए हमारे पास क्या प्रावधान है ? आज दुनिया तरक्की कर कहाँ से कहाँ पहुँच गई, विकसित देशों में रोबोट सैनिक युद्घ लड़ने को तैयार हो रहे है, और हमारे इस देश के ये कर्णधार इतनी सामान्य सी व्यवस्था नहीं कर पाते कि जहां पर इस तरह के भण्डारण की व्यवस्था की गई है वहाँ पर पहले तो ऐसी घटना ही न हो, अगर पूरी सजगता बरती जाए, लेकिन, यहाँ तो सब चलता है, हर कोई ड्यूटी के वक्त पर भी सो रहा होता है, या फिर पैसा कमाने का वैकल्पिक जुगाड़ तलाशने में लगा रहता है! बहुत सामान्य से बात है कि जहां पर इस तरह के संवेदनशील भण्डारण की व्यवस्था है उससे कुछ दूर हटकर जमीन के अन्दर...

वो कुर्ता-पजामा !

Image
पिछली होली के बाद के एक कवि सम्मलेन की यादे; कवि महोदय जगह-जगह पर सुई धागे से भद्दे ढंग से तुल्पे, सफ़ेद कुर्ता-पजामा पहने, चेहरे पर काफी खिन्नता लिए, गुस्से में मंच पर आये, और माथे का पसीना फोंझते हुए माइक थाम कर कविता गायन करने लगे; फाड़ दिया.... फाड़ दिया..... फाड़ दिया सालों ने ...... "अरे कविवर, क्या फाडा ? आगे भी बढो, आप तो यही पर अटक गए", दर्शक दीर्घा से एक आवाज आई तो कविवर आगे बढे ; याद है, जब तुम पिछली बार, मायके से आयी थी, वह गिफ्ट मेरे लिए लाई थी, सुन्दर, सफ़ेद चटकीला था. न ज्यादा टाइट था, और न ही ढीला था, मगर इस होली पर उसे, जो दिया था तुम्हारे मायके वालो ने ! मुझपर रंग मलने के बहाने, फाड़ दिया..... फाड़ दिया..... फाड़ दिया सालो ने !! कितना निखरता था, मेरे गठीले बदन पर, और तुम कहती थी , जब आप उसे पहन कर, किसी कवि सम्मलेन में जाते हो, सच में, तुम मंच पर, और कवियों से, एकदम अलग नजर आते हो, मगर इस होली पर, गली-मोहल्ले, ठेके  के दलालों ने! मुझपर रंग मलने के बहाने, फाड़ दिया..... फाड़ दिया..... फाड़ दिया सालो ने !! मुझे याद...

खाए-अघाये लोग और 'आम-धन का खेल' !

जाहिर है कि यह बात उन लोगो के लिए कोई मायने नहीं रखती जो कामरेड के कहने पर दो किलो चावल के लिए पुलिस गश्ती दल के वाहन के नीचे विस्फोटक लगा कर उसे उड़ा देते है, यह बात उन लोगो के लिए कोई मायने नहीं रखती जो कुछ कम्बलों और रोटियों के लिए पूरी ट्रेन का ही अपहरण कर बैठते है ! यह बात उन लोगो के लिए भी मायने नहीं रखती, जो चूहे मारकर उनका गोश्त खाने को मजबूर है, घास खाने को मजबूर है! यह बात मायने रखती है उनके लिए जो ठेकेदार है, और कॉमन वेल्थ खेलों के नाम पर कही किसी प्रोजक्ट से संबद्ध है, यह बात मायने रखती है, सरकारी मशीनरी के उन इंजीनियरों और प्लानिंग से सम्बंधित अफसरों के लिए, जो इन खेलो की ढाचागत सुविधाओं के निर्माण के लिए जिम्मेदार है, यह बात मायने रखती है उस खेल सस्था से जुड़े लोगो के लिए, जिसके ऊपर इसके आयोजन की जिम्मेदारी है, यह बात मायने रखती है उन नेतावो के लिए जिनके कंधो पर सफल आयोजन का सेहरा बाँधने का हक़ और खराब आयोजन के लिए दोषारोपण का भार दूसरो के ऊपर डालने का जिम्मा है, यह बात मायने रखती है यातायात और सुरक्षा से जुड़े लोगो के लिए, और अंत में यह बात मायने रखती है उस आम जनता के लिए, ...

इस नये ’वाद’ के मायने ?

इतिहासकारों की मानें तो पन्द्र्हवी-सोलहवीं सदी मे हमारे इस देश में कुछ गिने-चुने ही ’वाद’ मौजूद थे। जिनमे प्रमुख थे, सगुणवाद, निर्गुणवाद तथा रूढिवाद। यहां से शुरु हुआ इस “वाद” रूपी संक्रामक रोग का सफ़र उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक पहुचते-पहुंचते सामन्तवाद, जातिवाद, नस्लवाद, राष्ट्रवाद, अहिंसावाद और न जाने किन-किन वादों की अपनी अनेको मंजिले तय करता हुआ, आज एक्कीसवीं सदी के प्रारम्भिक पडाव मे क्षेत्रीयवाद, स्वायतवाद, स्वतन्त्रतावाद, मार्क्सवाद, मावोवाद और नक्सलवाद तक जा पहुंचा है। जहां एक ओर भयावह होती यह स्थित दिनो-दिन चिन्ता का विषय बन गई है, वहीं पिछ्ले कुछ सालों से एक और नये किस्म का वाद भी उभरकर सामने आया है, और वह है, नपुंसकतावाद। विदित रहे कि नपुंसक व्यक्ति प्रायः सभी उच्चगुणों के अभिवर्धन और साहस भरे पुरुषार्थी के सम्पादन में असमर्थ रहते हैं। और यहाँ इस वाद का उल्लेख मैं किसी व्यक्तिगत क्षमता के सन्दर्भ में नहीं कर रहा अपितु राष्ट्रीय हितों के सन्दर्भ में कर रहा हूँ। हांलाकि, अगर हम अपने अतीत को गौर से देखे तो इस बीमारी का कीटाणु भी हमारे शरीर मे सदियों पूर्व से विद्यमान रहा है...

लघु कथा- वह एक नर्स थी !

डा० मार्क, डा० श्रीवास्तव के एक अजीज मित्र थे, और डा० श्रीवास्तव के ही आमत्रण पर अमेरिका से भारत आये थे। डा० मार्क से डा० श्रीवास्तव की जान पहचान तब हुई थी, जब डा० श्रीवास्तव अमेरिका मे डाक्टरी कोर्स कर रहे थे। कोर्स खत्म होने के उपरान्त देश सेवा और खासकर ग्रामीण समाज की सेवा का जज्बा डा० श्रीवास्तव को स्वदेश खींच लाया था। यहां लौटकर उन्होने सरकारी नौकरी ज्वाइन की और राज्य सरकार के दूर-दराज के ग्रामीण अस्पतालों मे मरीजो को अपनी सेवायें प्रदान करने लगे। उस वक्त तक उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश से अलग राज्य नही था, अत: डा० श्रीवास्तव का तबाद्ला पहाडो की तलहटी मे बसे उस कस्बे के एक सरकारी अस्पताल मे हो गया था, जिसमे केरल की रहने वाली जैनी बतौर नर्स पिछले चार-पांच सालो से कार्यरत थी। हालांकि तब मै बहुत छोटा था, और शायद छठी कक्षा में पढता था। मुझे याद है कि सुन्दर और चुलबुले किस्म की जैनी स्वभाव से बहुत मिलनसार और भावनात्मक तौर पर दिल खोलकर दूसरों की मदद करने वाली थी। वह भारत के केरल प्रान्त के कोच्चि से करीब साठ किलोमीटर दूर अथीरापल्ली इलाके की मूल निवासी थी, और वाईएमसीए दिल्ली से प्रशिक्षित थी...

यह ऐसा अद्धभुत देश हमारा !

इस  पावन धरती ने कितने , भांति-भांति के जीव जने, कुछ गुल्फामों ने चमन उजाडे , कुछ गुलशन की नींव बने।  राम,कृष्ण और बुद्ध की भूमि, बाह्य-धावों,जुल्मों  ने चूमी , कहीं पोषे जयचंद बहुतेरे, कहीं वीर पृथ्वी जैसे वक्ष तने। कहीं बहती है प्यार की गंगा , कहीं नफरत करती है नंगा , कहीं खाप-पंच के पहरे होते  , और कहीं रांझा -हीर घने।   यह ऐसा अद्धभुत देश हमारा , हर बेबस को मिले सहारा , कहीं रंगों,कही खून की होली,  कहीं दीवाली और ईद मने।