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ठीक दस साल पहले मिली थी वो मुझे ! (दूसरा और अंतिम भाग)

...धीरे-धीरे शाम का धुंधलका जमीन पर पसरने लगा था, मैं फिर चलने के लिए खडा हुआ तो वह वह भी उठ खडी हो गई। अभी तक की इस मुलाक़ात से मानो किसी अधिकार पूर्ण अंदाज में जब एक बार फिर से मैंने उसे साथ चलने का इशारा किया, तो वह भी तुरंत मेरे साथ चल दी। पार्क के बाहर खडी गाडी के पास पहुँच मैंने गाडी की ड्राइविंग सीट के बगल वाली सीट के सामने का दरवाजा खोला तो वह झट से गाडी में चढ़कर सीट पर बैठ गई। और फिर मैं ड्राइव करता हुआ इंडिया गेट पहुंचा । अब तक घुप अँधेरे में पूरा इलाका डूब चुका था, मगर इंडिया गेट पर बिखरी बिजली की रोशनी से पूरा राजपथ जगमगा रहा था। एक जगह गाडी को पार्क कर हम गाडी में ही बैठे रहे। नए साल की पूर्व संध्या होने की वजह से मैंने अपने खाने-पीने का भी पहले से ही गाडी में पूरा इंतजाम रख छोड़ा था। वहाँ घूमते लोगो, ख़ासकर नए जोड़ो को निहारते और व्हिश्की के हल्के घूंटो के साथ मैं चिकन का सेवन करता और एक चिकन पीस उसकी तरफ बढ़ा देता था। वह भी बड़े चाव से आराम से बैठ कर खा रही थी, सलीके के साथ। फिर जब अचानक आकाश में कुछ आतिशबाजी दिखी, तो मैं समझ गया कि रात के बारह बज चुके है। ड्रिंक और खाने-प...

ठीक दस साल पहले मिली थी वो मुझे !

कब न जाने यु ही पलक झपकते दस साल गुजर गये, पता ही न चला। अचानक मुझसे मिलना और फिर कुछ ही लम्हों मे सदा के लिये मेरे साथ ही ठहर जाने का घडी भर मे लिया उसका वो फैसला आज भी वक्त बे-वक्त मुझे उन लम्हों के बारे मे सोचने पर मजबूर कर देता है। मैं समझता हूं कि इतनी जल्दी फैसला कोई भी प्राणि दो ही परिस्थितियों मे लेता है, एक तो तब जबकि उसे जो मिला है उसको पाने की उसकी चाहत बहुत पुरानी हो और अचानक वह उसे मिल जाये, दूसरा तब जबकि उसके पास और कोई विकल्प हो ही ना । मेरे हिसाब से उसके लिये भी शायद दूसरी परिस्थिति ही ज्यादा प्रबल रही होगी। बच्चो से बेहद लगाव रखने वाली स्वीटी ने दो बार दस सालो के दर्मियां मां बनने का असफ़ल प्रयास भी किया, लेकिन उसका दुर्भाग्य कि वह मातृत्व सुख पाने से वंचित रही, पैदा होने के चंद रोज बाद ही बच्चे चल बसे। स्वभाव से बहुत सरल और एक अजनवी से भी शीघ्र घुल-मिल जाने की उसकी खूबियों ने उसे शीघ्र ही मुह्ल्ले मे भी सबकी चेहती बना दिया। मौका मिलने पर हल्के-फुल्के मजाक करने से भी नही चूकती, मसलन सर्दियो मे जब सुबह-सबेरे बिस्तर से उतरते ही पैर चप्पल अथवा स्लिपर ढूढने लगते है, त...

समय आ गया है कि बीजेपी के प्रति मोह को भंग किया जाए !

आज जहां एक ओर देश की अस्सी प्रतिशत से अधिक आवादी महगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से त्रस्त है, वहीं दूसरी ओर सत्ता का मजा लूट रहे लोग, सार्वजनिक धन को दोनो हाथों से समेट लेने पर आम्दा है। विकास के नाम पर जहां एक ओर सार्वजनिक धन, जो कि जनता से ही भिन्न-भिन्न टै़क्स के रूप मे वसूला जाता है, को कुछ लोगो के फ़ायदे के लिये दोनो हाथो से लुटाया जा रहा है। पहले जानबूझकर धन और संसाधनो की कमी का रोना रोकर या फिर किसी और बहाने से, किसी भी परियोजना को अधर मे लटका दिया जाता है, और फिर भ्रष्ठ तरीके अपनाने के लिये समय सीमा बांध दी जाती है। जबाबदेही नाम की तो कोई चीज देश मे रह ही नही गई है। सरकार, लोगो को लूटने के नित नये तरीके इजाद करती रहती है । यहाँ टैक्स, वहाँ टैक्स। महंगाई की इस मार में अगर कोई व्यक्ति परिवार के साथ यात्रा कर रहा है तो उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सड़क छाप ढाबे भी १३.५ % वेट वसूल रहे है ! यानी परिवार संग ४०० रूपये का खाना ( जिसमे कि कुछ भी नहीं मिलता ) आपने इन ढाबो में खाया तो करीब ५५ रूपये सरकार के खाते में टैक्स भी भरो । जहां एक तरफ २००५ पांच में पिछले वित् मंत्री द्वारा वेतन भोग...

आ जाओ क्रिस, अब आ भी जाओ !

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जीसस  "क्रिस" यूं कब तलक तुम, ज़रा भी टस से "मस" नहीं होगे, गिरजे की वीरान चार दिवारी में , कब तक यूंही 'जस के तस' रहोगे ? ये वो  परोपकारी वक्त  नहीं जब, महापुरुष  लटक जाया करते थे, अमृत सारा का सारा औरों को बाँट , खुद  जहर  घटक जाया करते थे।   तुम सदियों से नीरव लटके खड़े हो, खामोशी की भी हद होती है भई, एक बार सूली से उतर कर तो देखो, दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई। दौलत -सोहरत की चकाचौंध में, सभ्यता निःवस्त्र घूम रही है, संस्कृति बचाती लाज फिर रही, बेशर्मी शिखर को चूम रही है। भाई,भाई का दुश्मन बन बैठा है , बेटा, बाप को लूटने की ताक में है, माँ कलयुग को कोसे जा रही है , बेटी घर से भागने की  फिराक  में है। लोर्ड क्रिस,अब तुम उतर भी आओ, पाप का अन्धेरा घनघोर छा गया है ! यह आपके लटकने का वक्त नहीं  है , शठों को लटकाने का वक्त आ गया है। Merry Christmas to all Blogger friends !

२००९ में रचित कुछ बिखरे मोतियों के विशष्ट अंश !

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यूँ तो बेवजह सुर्ख़ियों में आने का कभी शौक नहीं रहा, मगर जैसे कि शायद आप लोग भी जानते होंगे कि मेरे एक लेख की वजह से ब्लॉगजगत पर आजकल मेरी टी.आर.पी काफी ऊपर जाकर बैठी हुई है, इसलिए मैं फिलहाल कोई टुच्चा-मुच्चा लेख अथवा कविता लिखकर उसको नीचे नहीं लाना चाहता :) सन २००९ में मैं इस ब्लॉगजगत पर लगभग हर दिन उपस्थिति दर्ज करवाई , इसलिए सोचा कि चलो, जो साल जाने वाला है उसकी कुछ जो कविताये अथवा गजल मैं पढ़ पाया और मुझे अच्छी लगी, मैं यहाँ प्रस्तुत करू, ताकि अन्य ब्लॉगर मित्र जोकि उन्हें पढने से किसी वजह से वाचित रह गए हो, वे भी एक बार फिर से उन्हें पढ़ सके ! तो लीजिये प्रस्तुत है सब २००९ का काव्य लेखा-जोखा : यहाँ सिर्फ भिन्न-भिन्न रचनाकारों की मैं कविता या गजल के कुछ चुनिन्दा अंश ही प्रस्तुत कर रहा हूँ,साथ ही उस कविता या गजल का लिंक भी मैंने यहाँ पर दिया है, विस्तृत तौर पर आप उसे उस ब्लॉग पर जाकर पढ़ सकते है, और मुझे उम्मीद है कि इसपर किसी ब्लॉगरमित्र / रचनाकार को कोई आपति नहीं होगी ! शुरुआत करता हूँ आदरणीय डा० रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी की इस प्यारी से गजल से, उनकी गजल फ्रेम समेत पोस...

बेचारा !

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'नारी' की चिंता में दुबले कुछ ब्लॉगर मित्र !

पिछले कुछ दिनों से ब्लॉग जगत पर एक ख़ास बात के ऊपर नजर गडाए था ! देखना चाहता था कि अक्सर किसी एक ख़ास मुद्दे पर एक साथ लेखों की बाढ़ निकाल देने वाले हमारे ब्लॉगर बंधू-बांधव इस मामले पर कितने संजीदा है ! लेकिन यह जानकर निराशा हाथ लगी कि किसी ने भी इस और ध्यान देकर लिखना तो दूर, कहीं पर टिपण्णी करना भी मुनासिब नहीं समझा( हाँ अगर कुछ मेरी नजरो से ही छूट गया हो तो क्षमा चाहूंगा ) ! इस ब्लॉग जगत पर मैं अक्सर देखता हूँ कि महिलाओं से सम्बंधित बातो पर कुछ लोग नाहक ही दुबले हुए जाते है! साथ ही कुछ महिला ब्लोगर किसी ब्लोगर की सार्थक पहल को भी महज एक ढकोस्लाबाजी कहकर कई बार अप्रिय शब्दावली इस्तेमाल करती है! अभी हाल का एक उदहारण मैं इस तरह से देता हूँ कि इस ब्लॉग जगत के हमारे एक वरिष्ठ और सम्मानित ब्लॉगर श्री सी.एम् प्रसाद जी ने एक लेख लिखा था, 'महिला सुशिक्षित और सशक्त हो', उस लेख की कड़ी में एक महिला ब्लोगर की टिपण्णी निराशाजनक लगी ! मैं उस टिप्पणी की चर्चा यहाँ नहीं कर रहा, मगर इस लेख के माध्यम से एक छोटा सा संदेस उन लोगो तक पहुंचाना चाहता हूँ कि आपको यह समझना भी जरूरी है कि सिर्फ '...