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सांझ ढले

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प्रस्तावना स्वरुप अपनी एक पुरानी पोस्ट की चंद लाईने यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ; दिन तीन सौ पैसठ साल के, यों ऐसे निकल गए, मुट्ठी में बंद कुछ रेत-कण, ज्यों कहीं फिसल गए। उदास पलों में धड़कन भी, दिल से बेजार लगी, खुश लम्हों में जिन्दगी, चंचल निर्झरिणी धार लगी। संग आनंद, उमंग, उल्लास कुछ आकुल,विकल गए। दिन तीन सौ पैसठ साल के, यों ऐसे निकल गए।। मगर, यह भी सच्चाई है कि वक्त किसी का साथ नहीं देता, उसे निकलना ही है ! और यही गुजरते साल की भी एक कटु सच्चाई है ! समय के इन ३६५ लम्हों में दो ही बातें होती है, या तो अच्छी या फिर बुरी ! किसी के लिए यह साल एक खुशनुमा सौगात लेकर आया होगा तो किसी के लिए कभी न भुला सकने वाली असफलता और विषाद ! लेकिन समाज का एक बड़ा तबका ऐसा भी होता है जो इनके बीच का रास्ता चुनता है, और इसे नाम देता है 'मिश्रित' का! वैसे इस गुजरते साल के बारे में ज्यादातर की  राय यही है कि साल अच्छा नहीं रहा ! मगर हमें इस सच्चाई को भी स्वीकारना होगा कि सुख और दुःख एक सिक्के के ही दो पहलू हैं, और हर पहलू को हमें समान ...

दो टूक !

दुःख के साथ लिखना पड  रहा है कि आशंका, उम्मीद और अंदेशा शब्द तो मैं भारतीय राजनीति के लिए इस्तेमाल करता ही नहीं, इसलिए यह कहूंगा कि जो पूर्व नियोजित था, वही हुआ ! लोक सभा के बिल से बिना जहर वाला जो लोकपाल रूपी नाग जबरन बाहर निकाला गया था, वह राज्यसभा के बिल में जाकर फंस गया! देश में शिक्षा के आंकड़े बहुत उत्साह-वर्धक न होते हुए भी समय के साथ यह एक सुखद बात है कि भारतीय जनता भी अब काफी हद तक शिक्षित हो गयी है, और इलेक्ट्रोनिक क्रान्ति के इस युग में लोकतंत्र की जो नौटंकी इस देश की जनता ने २७ और २९ दिसंबर को अपने टेलीविजन सेटों पर देखी, उससे उसे इतना तो अहसास हो ही गया है कि उनका प्रतिनिधित्व और देश की बागडोर किन हाथों में है, ये हाथ कितने मजबूत, साफ़-सुथरे और सुरक्षित है! हाँ, लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही देखने और अपने माननीय प्रतिनिधियों को सुनने के बाद एक और बात जो इस जनता ने महसूस की वह यह कि पढ़े-लिखे और अनपढ़-गंवार को सुनने का क्या फर्क अथवा आनंद होता है! साथ ही यह भी महसूस हुआ कि इस देश की जनता के कुछ तथाकथित प्रतिनिधि, अपनी जनता को ब्रिटिश काल के नजरिये से ख़ास अलग नहीं द...

अभिलाषा मेरी !

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अगर ऐसा होवे नए साल में, मिले न काला कहीं दाल में,  जंगलराज भी  ख़त्म हो जाए, कोई गधा  न घूमें शेरखाल में। अंधा चुने न ठग काने वाले ,  शठ बहेलिया न दाना डाले, पंछी फंसें न किसी जाल में, काश ! ऐसा होवे नए साल में। दीप प्रज्वलित हो बुद्धि-ज्ञान का, प्राबल्य विनाश हो अभिमान का, बैठा न अब उलूक डाल-ड़ाल में,  अगर ऐसा होवे नए साल में । हर जन की ये ही तमन्ना होए, भूखे पेट कोई जन ना सोए, जिये न कभी कोई बदहाल में , काश ! ऐसा होवे नए साल में। लूट-खसौट न कहीं रहे साधना, भारतीयता की बची रहे भावना, देश सलामत रहेगा हर हाल में,  अगर ऐसा होवे नए साल में।  

दीवानगी !

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मनसूबे  अगर  हमारे तनिक  भी  नापाक होते,  प्यार की तपिश में न यूं जलकर खाक होते। गोकि उल्फत न दस्तक देती दिल के द्वार पर, दर्द के न हररोज अजीब ऐसे इत्तेफाक होते।   छवि  गूगल  से  साभार ! 

इस 'अपरस' रोग का क्या कोई इलाज है?

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यूं तो 'अपरस' शब्द अपने आप में बहुत व्यापक अर्थ समेटे हुए है, लेकिन इस आलेख की पृष्ठ-भूमि में इस शब्द के आम इस्तेमाल होने वाले और गौर करने लायक जो प्रमुख अर्थ मौजूद है, वे है ; अपने को सर्वोपरि समझने वाला, घमंडी, स्वार्थी, अपने बड़ों का आदर न करने वाला, अकारण भय पैदा करने वाला और नसीहत देने वाला इंसान। आज के परिपेक्ष में जबकि न सिर्फ हमारा देश अपितु पूरी दुनिया विभिन्न स्तरों पर एक वर्ग विशेष द्वारा स्थापित भ्रष्टाचार से त्रस्त होकर सामाजिक उथल-पुथल, असहजता और वैचारिक समुद्रमंथन के दौर से गुजर रही है, तब ये शब्द हमारे समाज के किस ख़ास वर्ग अथवा चरित्र पर सटीक बैठते है, मैं समझता हूँ कि उसे यहाँ खुलकर बताने की आवश्यकता नहीं है। भिन्न अर्थों में, या यूँ कहें कि जीव विज्ञानं की भाषा में इस शब्द का अर्थ इस तरह से समझा जा सकता है कि इसका इस्तेमाल त्वचा से सम्बंधित एक ख़ास किस्म के चर्म रोग, जिसे अंगरेजी में सोरियासिस (PSORIASIS) के नाम से जाना जाता है, के लिए होता है। यह एक प्रकार का असंक्रामक दीर्घकालिक त्वचा विकार (चर्मरोग) है जो कि परिवारों के बीच चलता रहता है। इस रोग से ग्रस्...

घर का शौहर !

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फिर से देहरी पे  क्रिसमस और नवबर्ष  दस्तक  देने को है  और   मैं जानता हूँ कि मेरी आरजुओं की थमी झील में तुम फिर एक बार ख्वाइशों की तैरती कश्ती से अपनी फरमाइशों का लंबा जाल फेंकोगी।   तुम्हारी फरमाइशें भी क्या कहने,  मासा अल्लाह ! अभी, गुजरे साल की ही तो बात है, क्रिसमस पर तुम्हे ताजमहल दिखाने ले गया था, और तुम अड़ गई थी, खुद की  अकेली  एक   फोटो खिंचवाने की जिद पर, और मैंने भी बड़ी कुशलता से तारे जमीं पर उतारे बिना ही तुम्हारी वह ख्वाइश भी पूरी की थी। मगर तुम हो कि मेरी अक्लमंदी की दाद देने के बजाये, पड़ोसनो के शौहरों  का ही गुणगान करते नहीं थकती, खैर, तुम खुश रहो, इसी में समूचे जगत का सुख निहितार्थ है, मेरा क्या, पैदाइशी चार आँखे लेकर आया था, दो तुम्हें तकते फूटी, दो इंटरनेट  पर   !! छवि नेट से साभार !

सामूहिक रिश्वत की राजनीति !

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यूं तो भारतीय राजनीति में सत्ता की गद्दी का मोह १९३० के दशक से ही तभी प्रबल रूप धारण करने लगा था, जब १९३७ में राष्ट्रपति ( कौंग्रेस अध्यक्ष को तब राष्ट्रपति कहते थे) पद के चुनाव के लिए राजगोपालाचारी द्वारा चुनाव लड़ने से इनकार करने के बाद सरदार पटेल ने अपनी दावेदारी पेश की थी, मगर जवाहरलाल नेहरू ने गांधी जी से यह कहकर उनकी उम्मीदवारी वापस करवाई कि इस पद के लिए मेरा (नेहरु का ) १ वर्ष का कार्यकाल काफी नहीं है, अत: मैं दोबारा राष्ट्रपति बनना चाहता हूँ ! इसी तरह गद्दी के लालच में स्वतंत्रता के बाद चुनाव में वोटरों को खरीदने का जो दौर ६० के दशक से शुरू हुआ था, वह चंद मुट्ठी अनाज से शुरू होकर आज नकदी, कलर टीवी और लैपटॉप तक जा पहुंचा है ! पहले न सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों में बल्कि कस्बों, शहरों में भी दलितों को दबंग लोग वोट नहीं डालने देते थे, उसके बाद जब थोड़ा बहुत ग्राम पंचायतें सुदृढ़ हुई और नामदेव दशल, राजा धाले,अरुण कमले और कांशीराम जैसे दलित नेताओं के नेतृत्व में अनेकों दलित नेता उभरकर आये तो उनके ही घरों में पसेरी चावल पहुंचाकर इन दबंगों ने उनके पूरे कुनवे ...